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________________ गाथा १२३ ] कसायोवसामगस्स अधापवत्तकरणणिहेसो २११ मत्थित्तपदंसणमुहेण उवरिमकरणपयारस्स साहलत्तं परूविदं ति दट्ठव्वं । अघवा 'उवरि' 'हदं' एवं भणिदे ताहिं दोहिं किरियाहिं घादिज्जमाणट्टिदि-अणुभागसंतकम्ममुवरिमं पुव्वं चेव हदं धादिदं, तदो तत्तो हेट्ठिमट्ठिदि-अणुभाग-संतकम्माणि घादिदावसेसरूवाणि अस्सिदूण उवरिमं पबंधमवदारयिस्सामो त्ति एसो एदस्साहिप्पायो । अधवा 'उवरि हदं' एवं भणंतस्साभिपायो सव्वत्थेव द्विदि-अणुभागघादं कुणमाणो हेट्ठा मज्झे वा ण हणदि, किंतु उवरि चेव हणदि द्विदि-अणुभागसंतकम्माणमुवरिमभागे चेव केत्तियं पि घेत्तूण डिदि-अणुभागखंडयघादमाचरदि त्ति युत्तं होइ । अथवा अणंताणुबंधी विसंजोइय वेदयसम्मत्तमुवसामिय कसायोवसामणाए पयट्टमाणेण दोहिं किरियाहिं मिलिदाहिं जं कम्मं हदं तमुवरि हदमिदि भणिदे दंसणमोहणीयं खविय उवसमसेढिं चढमाणो दसणमोहक्खवएण हेट्ठा घादिज्जमाणहिदि-अणुभागेहिंतो उवरि चेव हदं । एत्तो संखेज्जगुणहीणमणंतगुणं च द्विदि-अणुभागसंतकम्मं कादूण खइयसम्माइट्ठी उवसमसेढिं चढदि त्ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्थो । एदेण दसणमोहणीयं खविय इगिवीससंतकम्मिओ उवसमसेटिं चढमाणपाओग्गो होदि चि एसो अत्थविसेसो जाणाविदो होदि, अण्णहा पुव्विल्लपरूवणाए चउवीससंतकम्मियोवसमसम्माइहिस्सेव उवसमसेढिपाओग्गभावावहारणप्संगादो। अण्णे वुण 'तमुवरि हम्मदि' त्ति पाठंतरमवलंबमाणा एवमेत्थसुलत्थसमत्थणं करेंति । तं जहा–जं कर्म अणंताणुबंधी उपरिम करणोंकी सफलता कही गई है ऐसा जानना चाहिए । अथवा 'उवरि हदं' ऐसा कहनेपर उन दोनों क्रियाओं के द्वारा घाते जानेवाले उपरिम स्थिति-अनुभाग सत्कर्मका पहले ही घात कर दिया है, इसलिए उनद्वारा घात करनेसे शेष बचे हुए अधस्तन स्थितिअनुभागसत्कर्मोंका आश्रय कर आगेके प्रबन्धका अवतार करेंगे यह इस सूत्रका अभिप्राय है । अथवा 'उवरि हदं' ऐसा कहनेवाले आचार्यका अभिप्राय है कि सभी जगह स्थिति और अनुभागका घात करनेवाला जीव नीचेके या बीचके स्थितिअनुभागसत्कर्मका घात नहीं करता, किन्तु 'उवरि चेव हणदि' अर्थात् स्थिति-अनुभागसत्कर्मोंके उपरिम भागमेंसे कुछ ही को ग्रहण कर स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अथवा अनन्तानुबन्धीका विसंयोजनकर और वेदकसम्यक्त्वको उपशमाकर कषायोंको उपशमानेके लिये प्रवृत्ति हुए जीवने मिली हुई दो क्रियाओं द्वारा जिस कर्मको नष्ट किया 'तं उवरि हदं' ऐसा कहने पर दर्शनमोहका क्षयकर उपशमश्रेणि पर चढ़नेवाले दर्शनमोहके क्षपकने पूर्व में घाते जानेवाले स्थिति और अनुभागकी अपेक्षा अधिक कमेका ही घात किया। इससे स्थितिसत्कर्म और अनुभागसत्कर्मको संख्यात गुणहानि और अनन्तगुणा करके झायिकसम्यग्दृष्टि जीव उपशमणि पर चढ़ता है यह इस सूत्रका भावार्थ है। इस कथन द्वारा दर्शनमोहनीयका क्षय करके मोहनीयकी इक्कीस प्रकृतियोंके सत्कर्मवाला जीव उपशमश्रेणि पर चढ़नेके योग्य होता है इस अर्थविशेषका ज्ञान कराया गया है, अन्यथा पहलेकी प्ररूपणाके अनुसार चौवीस कर्मप्रकृतियोंकी सत्तावाला उपशमसम्यग्दृष्टि जीव ही उपशमणिके योग्य है ऐसा अवधारण करनेका प्रसंग प्राप्त होता है। परन्तु दूसरे आचार्य
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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