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________________ २१० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणा * तदो कसाए उवसामेदं कच्चे अधापवत्तकरणस्स परिणाम परिणमइ । ३४. तदो पमत्तापमत्तपरावत्तसहस्सवावारादो अणंतरमुवसमसेढिपाओग्गविसोहीए विसुज्झियण कसायाणमुवसामणट्ठमधापवत्तकरणपरिणामं परिणमदि त्ति मणिदं होइ । कषायानुपशमयितुमद्यतः तस्य कृत्ये तस्य कृते आद्यं करणपरिणाममधःप्रवृत्तसंज्ञमेष कृताशेषपरिकरकरणीय परिणमत इत्यर्थः। एदेण हेडिमासेसपरूवणा कसायावसामणाए परिकरभावेण विहासिदा । एत्तो उवरिमा पुण कसायोवसामगस्स परूवणा त्ति जाणाविदं । * जं अणंताणुषंधी विसंजोएंतेण हदं दसणमोहणीयं च उवसातेण हद कम्मं तमुवरि हदं । ____$ ३५ जं कम्ममणंताणुबंधिणो विसंजोएंतेण हदं, जं च दंसणमोहणीयमुवसामेंतेण हदं तं सव्वं कसायोवसामगेण घादिजमाणहिदि-अणुभागसंतकम्मादो उवरिमं चेव हदं णो हेट्ठा ति भणिदं होइ । एदेण कसायोवसामगस्स घादिज्जमाणट्ठिदि-अणुभागाण ३४. तत्पश्चात् हजारों प्रमत्त और अप्रमत्तसम्बन्धी परावर्तनरूप व्यापारके बाद उपशमश्रेणिके योग्य विशुद्धिसे विशुद्ध होता हुआ कषायोंको उपशमानेके लिये अधःप्रवृत्तकरण परिणामरूप परिणमता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। कषायोंको उपशमानेके लिए उद्यत हुआ: जीव 'तस्य कृत्ये' अर्थात् उसके लिये सबसे प्रथम जो अधःप्रवृत्त संज्ञावाला करणपरिणाम है उस रूप, यह समस्त करणीय परिकरसे सम्पन्न होकर, परिणमता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इस द्वारा अधस्तन समस्त प्ररूपणाका कषायके उपशामनाके परिकररूपसे व्याख्यान किया गया। परन्तु इससे उपरिम प्ररूपणा कषायोंके उपशामकसम्बन्धी है यह ज्ञान कराया गया है। विशेषार्थ-आशय यह है कि द्वितीयोपशम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके बाद हजारों बार प्रमत्त-अप्रमत्तसंयत होता है। उसके बाद सातिशय अप्रमत्तभावको प्राप्त कर उपशमणि पर आरोहण करनेके लिए अधःप्रवृत्तकरणभावको प्राप्त होता है। * अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करनेवाले जीवने जो कर्म नष्ट किया और दशनमोहनीयकी उपशामना करनेवाले जीवने जो कर्म नष्ट किया वह स्थितिअनुभागसत्कर्मकी अपेक्षा उपरिम कर्म ही नष्ट किया । $ ३५. अनन्ताबन्धीकी विसंयोजना करनेवाले जीवने जो कर्म नष्ट किया और दर्शनमोहनीयकी उपशामना करनेवाले जीवने जो कर्म नष्ट किया वह सब कषायोंकी उपशामना करनेवाले जीवके द्वारा घाते जानेवाले स्थिति-अनुभागसत्कर्मसे जो उपरिम कर्म है वही नष्ट किया गया, अधस्तन कर्म नहीं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इस वचन द्वारा कषायोंका उपशामक जिन स्थिति-अनुभागवाले कर्मोंका घात करनेवाला है उनका अस्तित्व दिखलाकर
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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