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________________ गाथा १२३ ] दंसमोहणीय-उवसामणाणिसो २०३ विसया दंसणमोहोत्रसामणा पुव्वं व परुविदत्तादो एहि परूवेयच्या त्ति घेतव्वं । * तदो दंसणमोहणीयमुवसामेंतस्स जाणि करणाणि पुत्र्वपरूविदाणि ताणि सव्वाणि इमस्स वि परूवेयत्र्वाणि । २४. पुव्वं दंसणमोहणीयमुत्रसामेमाणस्स अणादिय मिच्छाइट्टिम्स जाणि करणाणि अधापवत्तादिमेयभिण्णाणि परूविदाणि ताणि सव्वाणि णिरवसेसमेत्थाणुगंतव्वाणि विसेसाभावादो त भणिदं होदि । एदेहिं करणेहिं कीरमाणकजभेदो वि तहा चेय परूवेयव्वोत्ति जाणावणट्ठमिदमाह - * तहा ट्ठिदिघादो अणुभागघादो गुणसेढी च अत्थि । $ २५. जहा पढमसम्मत्तमुप्पाएमाणस्स डिदि - अणुभागवादो गुणसेढी च अत्थि, ता एत्थ वि सिमत्थितमवगंतव्वं, ण तत्थ किंचि णाणचमत्थि ति भणिदं होइ । तं कथं ? अधापवाकरणे ताव णन्थि द्विदिघादो अणुभागघादो गुणसेढी वि, केवलमतगुणा विसोही विसुज्झमाणो सगद्धाए संखेजसहरूसमेत्ताणि द्विदिबंधोरणाणि करेदि । अप्पसत्थाणं कम्माणं समयं पडि अनंतगुणहाणीए विद्वानियमणुभागं बंधइ | पसत्याणं कम्माणमणंतगुणवड्डीए चउट्टाणियमणुभागबंधं बंधदि । एवमेदेण इसलिये वेदकसम्यग्दृष्टिविषयक दर्शनमोहकी उपशामना पहले के समान कही गई होनेसे इस समय कही जानी चाहिए ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । * तदनन्तर दर्शनमोहनीयका उपशम करनेवालेके जो करण पहले कह आये हैं। वे सब इसके भी कहने चाहिए | $ २४. दर्शनमोहनीयकी उपशामना करनेवाले अनादि मिथ्यादृष्टिके पहले अधःप्रवृत्तकरण आदि भेदरूप करण कह आये हैं वे सब यहाँ भी जानने चाहिए, क्योंकि उनसे इनमें कोई विशेषता नहीं है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । तथा इन करणोंद्वारा किये जानेवाले काचभेदका कथन भी उसी प्रकार कहना चाहिए इस बातका ज्ञान करानेक लिये इस सूत्र का कहते हैं * उसी प्रकार स्थितिघात, अनुभागघात और गुणश्रेणि होती है । $ २५. प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवालेके जिस प्रकार स्थितिघात, अनुभागघात और गुणश्रेणि होती हैं उसी प्रकार यहाँ पर भी उनका अस्तित्व जानना चाहिए, उनमें कुछ फरक नहीं है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । शंका- वह कैसे ? समाधान — अधःप्रवृत्तकरणमें तो स्थितिघात, अनुभागघात और गुणश्रेणि भी नहीं है, केवल अनन्तगुणी विशुद्धिसे विशुद्ध होता हुआ अपने कालमें संख्यात हजार स्थितिबन्धापरणोंको करता है । अप्रस्त कर्मोंके प्रति समय अनन्तगुणी हानिरूपसे द्विस्थानीय अनुभागको बाँधता है तथा प्रशस्त कर्मोंके अनन्तगुणी वृद्धिरूपसे चतुःस्थानीय अनुभागको
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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