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________________ २०४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरितमोहणीय-उवसामणा विहाणेण सगद्धमणुपालिय' तदो से काले पढमसमयअपुव्वकरणो होइ । ताधे चेव द्विदिघादो अणुभागघादो गुणसेढी च समगमाढत्ता । गुणसंकगो णस्थि । डिदिखंडयपमाणं पलिदोवमम्स संखेजदिभागो। अणुभागखंडयपमाणमप्पसत्थाणं कम्माणमणुभागसंतकम्मस्स अणंता भागा । गुणसेढिणिक्खेवो पुण अपुव्वकरणद्धादो अणिय ट्टिकरणद्धादो च विसेसाहिओ गलिदसेसायामो च । ताधे चेव द्विदिबंधो अधापवत्त करणचरिमविदिबंधादो पलिदोवमस्स संखेजदिमागेणूणो पबद्धो। एकम्मि द्विदिखंडयकालभंतरे संखेजसहस्समेत्ताणि अणुभागखंडयाणि अंतोमुहुत्तुकीरणद्धापडिबद्धाणि । एवमेदीए परूवणाए सगद्धमणुपालिय तदो चरिमसमयअपुव्वकरणो जादो। ताधे अपुव्वकरणपढमसमयढिदिसंतकम्मादो संखेजगुणहीणं डिदिसंतकम्मं होदि त्ति जाणावणफलमुत्तरसुत्तं * अपुव्वरणस्स जं पढमसमए ट्ठिदिसंतकम्मं तं चरिमसमए संखेनगुणहीणं । २६. एत्थ जइ वि द्विदिबंधो संखेजगुणहीणो त्ति ण वुत्तो तो वि अत्थदो तस्स संखेजगुणहीणत्तमवगम्मदे, द्विदिखंडय-द्विदिबंधोसरणवसेण बंध-संताणं तहाभावोववत्तीदो। एवमपुव्वकरणद्धमुल्लंघियण से काले पढमसमयाणियट्टिकरणो जादो । बाँधता है । इस प्रकार इस विधिसे अपने कालको सम्पन्न कर उसके बाद तदनन्तर समयमें प्रथम समयवर्ती अपूर्वकरण होता है और तभी स्थितिघात, अनुभागघात और गुणश्रेणिको एक साथ आरम्भ करता है । यहाँ गुणसंक्रम नहीं है। स्थितिकाण्डकका प्रमाण पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण है। अनुभागकाण्डकका प्रमाण अप्रशस्त कर्मो के अनुभागसत्कर्मके अनन्त बहुभागप्रमाण है। गुणश्रेणि निक्षेप तो अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणके कालसे विशेष अधिक और गलित शेष आयामवाला है। तभी स्थितिबन्ध अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयके स्थितिबन्धसे पल्योपमका संख्यातवां भाग कम बँधता है। एक स्थितिकाण्डकके कालके भीतर संख्यात हजार अनुभागकाण्डक होते हैं। जिनमेंसे प्रत्येकका उत्कीरण काल अन्तर्मुहूर्त है। इस प्रकार इस प्ररूपणाके साथ अपने कालको सम्पन्न करके तब अन्तिम समयवर्ती अपूर्वकरण हो जाता है। तब अपूर्वकरणके प्रथम समयके स्थितिसत्कर्मसे संख्यात गुणा हीन स्थितिसत्कर्म होता है इस बातका ज्ञान कराना है फल जिसका ऐसे आगेके सूत्रको कहते हैं * अपूर्वकरण के प्रथम समयमें जो स्थितिसत्कर्म है वह अन्तिम समयमें संख्यातगुणा हीन हो जाता है। २६. यहाँपर यद्यपि स्थितिबन्ध संख्यातगुणा हीन हो गया है यह नहीं कहा है तो भी वास्तवमें उसका संख्यातगुणा हीनपना जाना जाता है, क्योंकि स्थितिकाण्डकघात और स्थितिबन्धापसरणवश बन्ध और सत्त्व उस प्रकारसे बन जाते हैं। इसप्रकार अपूर्वकरणके कालको उल्लंघनकर तदनन्तर समयमें प्रथम समयवर्ती अनिवृत्तिकरण हो जाता है। १ ता०प्रती मणुफालिय इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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