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________________ गाथा १२३ ] अणंताणुबंधिविसंयोजणाणिहेसो दट्ठव्वं । एवमधापवत्तकरणं बोलिय तदो अपुव्वकरणं पविट्ठस्स कीरमाणकजभेदपदुप्पायणमुत्तरसुत्तं___ * अपुवकरणे अस्थि द्विविधादो अणुभागधादो गुणसेढी च गुणसंकमो वि। $१९ एत्थ द्विदिघादादीणं परूवणा जहा दंसणमोहक्खवणाए मिच्छत्तस्स परूविदा तहा चेव णिरवयवमणुगंतव्वा । णवरि एत्थतणगुणसेढी सम्मत्तप्पत्ति-संजदासंजद-संजदगुणसेढीहितो पदेसग्गेणासंखेजगुणा होदूण तदायामादो संखेजगुणहीणायामा होइ । गुणसंकमो पुण अणंताणुबंधीणमेव, णाण्णेसिं कम्माणमिदि वत्तव्यं । एवं संखेजेहिं द्विदिखंडयसहस्सेहिं ठिदिबंधोसरणसहगएहिं पादेकमणुभागखंडयसहस्साविणाभावीहिं अपुव्वकरणद्धा समप्पइ । अपुन्यकरणस्स पढमसमयट्ठिदिबंधादो द्विदिसंतकम्मादो च तस्सेव चरिमसमए द्विदिसंत-ट्ठिदिसंकम्माणि संखेजगुणहीणाणि । तदो पढमसमयअणियट्टिकरणो जादो। ताधे अणंताणुबंधीणं द्विदिसंतकम्ममंतोकोडाकोडीए सागरोवमसदसहस्सपधत्तं । सेसाणं कम्माणं अंतोकोडाकोडीए । पुणो वि अणियधिकरणं पविट्ठस्स वि एवं चेव द्विदि-अणुभागखंडय-द्विदिबंधोसरण-गुणसेढिणिजरा-गुणसंकमपरिणामा णिव्यामोहमणुगंतव्वा त्ति पदुप्पायणट्ठमुत्तरसुत्तावयारोरूपसे अनुभागबन्धापसरण और शुभ कर्मोका अनन्तगुणी वृद्धिरूपसे चतुःस्थानीय अनुभागबन्ध यह यहाँ अधःप्रवृत्तकरणरूप विशुद्धियोंका फल जानना चाहिए। इस प्रकार अधःप्रवृत्तकरणको विताकर उसके बाद अपूर्वकरणमें प्रविष्ट हुए जीवके किये जानेवाले कार्योंके भेदका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रको कहते हैं * अपूर्वकरणमें स्थितिघात, अनुभागघात और गुणश्रेणि है, गुणसंक्रम भी है। ६१९ दर्शनमोहकी क्षपणामें जिस प्रकार मिथ्यात्वके स्थितिघात आदिकी प्ररूपणा की है उसी प्रकार पूरी प्ररूपणा यहाँ जाननी चाहिए। इतनी विशेषता है कि यहाँकी गुणश्रेणि सम्यक्त्वकी उत्पत्ति, संयतासंयत और संयतसम्बन्धी गुणश्रेणियोंसे प्रदेशोंकी अपेक्षा असंख्यात गुणी है, तथा उनके आयामसे संख्यातगुणी हीन है। परन्तु गुणसंक्रम अनन्तानुबन्धियोंका ही होता है, अन्य कमौका नहीं होता ऐसा कहना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक हजारों अनुभागकाण्डकोंके अविनाभावी ऐसे स्थितिबन्धापसरणोंके साथ होनेवाले हजारों स्थितिकाण्डकों के द्वारा अपूर्वकरणके कालको समाप्त करता है। अपूर्वकरणके प्रथम समयमें जो स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्म होता है उससे उसके अन्तिम समयमें स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा हीन होता है । तत्पश्चात् प्रथम समयवर्ती अनिवृत्तिकरणवाला हो जाता है। तब अनन्तानुबन्धियोंका स्थितिसत्कर्म अन्तःकोड़ाकोड़ीके भीतर लक्षपृथक्त्वसागरोपमप्रमाण होता है। शेष कोका अन्तःकोड़ाकोड़ीके भीतर होता है। फिर भी अनिवृत्तिकरणमें प्रविष्ट हुए जीवके भी इसी प्रकार स्थितिकाण्डक. अनुभागकाण्डक, स्थितिबन्धोपसरण, गणश्रेणि निर्जरा और गुणसंक्रम परिणाम व्यामोहके बिना जानना चाहिए इसका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रका अवतार करते हैं
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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