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________________ गाथा १२३ ] अर्णताणुबंधिनिसंयोजणाणिदेसो १९७ वेदयसम्माइट्ठिस्स कसायोवसोमणाणिवंधणदंसणमोहोवसामणादिकिरियासु पवुत्तीए असंभवादो। तदो तव्विसंजोयणमेव पुग्वं परवेमाणो तदवसरकरणमुत्तरसुत्तं भणइ___* वेदयसम्माइट्ठी अणंताणुपंधी अविसंजोएदूण कसाए उवसामेदूं णो उवठ्ठादि । १३. जो अट्ठावीससंतकम्मिओ वेदयसम्माइट्ठी संजदो सो जाव अणंताणुबंधिचउक्कं ण विसंजोएदि ताव कसाए उवसामे, णो उवक्कमदि । कुदो ? तेसिमविसंजोयणाए तस्स उवसमसेविषडणपाओग्गभावासंभवादो। तदो अणंताणुबंधिविसंजोयणाए चेव पढममेसो पयदि ति जाणावणमुत्तरसुत्तारंभो * सो ताव पुब्वमेव अणताणुबंधी विसंजोएदि । १४. सुगमं । * तदो अणंताणुपंक्षी विसंजोएंतस्स जाणि करणाणि ताणि सव्वाणि परवेयवाणि। १५. कुदो १ करणपरिमाणेहिं विणा तव्विसंजोयणाणुववत्तीदो । काणि पुण ताणि करणाणि त्ति आसंकिय पुच्छाणिद्देसमाह शामनाके निमित्तरूप दर्शनमोहकी उपशामनादि क्रियाओं में प्रवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिये अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजनाका ही सर्वप्रथम कथन करते हुए उसका अवसर करनेके लिये आगेके सूत्रको कहते हैं * वेदकसम्यग्दृष्टि जीव अनन्तानुबन्धीचतुष्कको विसंयोजना किये विना कषायोंको उपशमानेके लिये प्रवृत्त नहीं होता है । $ १३. अट्ठाईस सत्कर्मवाला जो वेदकसम्यग्दृष्टि संयत है वह जब तक अनन्तानुबन्धीचतुष्कको विसंयोजना नहीं करता है तब तक कषायोंको उपशमानेके लिए प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना न होनेपर उसके उपशमश्रेणिपर चढ़नेके योग्य परिणाम नहीं हो सकते। इसलिए अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजनामें ही यह सर्व प्रथम प्रवृत्त होता है इस बातका शान करानेके लिये आगेके सूत्रका प्रारम्भ करते हैं * वह सर्वप्रथम अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना करता है। $ १४ यह सूत्र सुगम है। * इसलिए अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना करनेवाले जीवके जो करण होते हैं उन सबका कथन करना चाहिए । ६१५ क्योंकि करणपरिणामोंके बिना अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना नहीं बन सकती। वे करण कौन हैं ऐसी आशंका कर पृच्छासूत्रकानिर्देश करते हैं
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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