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________________ १९६ जयधवलासहिदे फसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणी वोच्छेदाणुसारेण वेदयदि त्ति एसो एदस्स सुत्तस्स पिंडत्थो। एवमेदाओ अट्ठ चेव सुत्तगाहाओ चरित्तमोहोवसामणाए पडिषद्धाओ त्ति जाणावणट्ठमेत्थ सुत्तसमत्तीए अट्ठण्हमंकविण्णासो कओ । एवमेसा संखेषेण गाहासुत्ताणमत्थपरूवणा कया। वित्थारत्थपरूवणमुवरि चुण्णिसुत्तसंबंधेण कस्सामी । संपहि एवं समुक्कित्तिदाणं गाहासुत्ताणमत्थविहासणं कुणमाणो तत्थ ताव तस्सेव परिकरभावेण सुत्तसूचिदपरिभासिदत्थपरूवणट्ठमुत्तरमुत्तावयारो * चरित्तमोहणीयस्स उपसामणाए पुव्वं गमणिज्जा उवकमपरिभासा। ११. उपक्रमणमुपक्रमः समीपीकरणं प्रारंभ इत्यनान्तरम् । तस्य परिभाषा उपक्रमपरिभाषा । सा प्रथमतरमेव तावत्प्ररूपयितव्येति सूत्रार्थः । * तं जहा। १२. सा उवक्कमपरिभासा केरिसी होइ त्ति पुच्छा कदा भवदि । सा च उवक्कमपरिभासा एत्थ दुविहा होइ-अणंताणुबंधिविसंजोयणा दंसणमोहोवसामणा घेदि । तत्थ ताव पवमणंताणुबंधिविसंजोयणा परूवेयव्या, अविसंजोइदाणंताणुबंधिचउक्कस्स पश्चात् आनुपर्वीसे उदयव्युच्छित्तिके अनुसार वेदन करता है यह इस सूत्रका समुच्चयरूप अर्थ है। इस प्रकार ये आठ ही सूत्रगाथाएं चारित्रमोहोपशामनामें प्रतिबद्ध हैं इसका ज्ञान करानेके लिये यहाँ पर गाथासूत्रोंकी समाप्ति होने पर आठ अंकका विन्यास किया है। इस प्रकार संक्षेपमें गाथा सूत्रोंकी यह अर्थप्ररूपणा की। विस्तारसे अर्थका कथन आगे चूर्णिसूत्रके सम्बन्धसे करेंगे। अब इस प्रकार निर्दिष्ट किये गये गाथासूत्रोंके अर्थका विशेष व्याख्यान करते हुए वहाँ सर्व प्रथम उसीके फरिकररूपसे गाथासूत्रों द्वारा सूचित परिभाषारूप अर्थका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रका अवतार करते हैं * चारित्रमोहनीयकी उपशामनाके विषयमें सर्वप्रथम उपक्रम-परिभाषा जानने योग्य है। ११. उपक्रम शब्दकी व्युत्पत्ति है-उपक्रमणं उपक्रमः । उपक्रम, समीपीकरण और प्रारम्भ इन तीनों शब्दोंका एक ही अर्थ है। उसकी परिभाषा उपक्रमपरिभाषा है। वह सर्व प्रथम ही प्ररूपण करने योग्य है यह इस सूत्रका अर्थ है। * वह जैसे। ६ १२. वह उपक्रम-परिभाषा किस प्रकारकी है यह पृच्छा की गई हैं। वह उपक्रमपरिभाषा प्रकृतमें दो प्रकारकी है-अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना और दर्शनमोहकी उपशामना। उसमें सर्वप्रथम अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजनाका कथन करना चाहिए, जिसने अनन्तानन्धीचतुष्ककी विसंयोजना नहीं की है ऐसे वेदकसम्यग्दृष्टि जीवकी कषायोंकी उप
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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