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________________ गाथा ११५ ] संजमट्ठाणाणं अप्पाबहुअं १८१ गुण । तं कस्स ? सेसपंचखंडणिवासि० मिच्छाइट्ठि० तप्पाओग्ग० विसुद्ध० संजमं गेण्हमाणस्स पढमसमय० । तस्सेव उक्क० पडिवज० अणंतगुणं । तं कस्स ? संजदासंजदस्स सव्वविसुद्ध० संजमं गेण्ह० पढमसमय० । कम्मभूमि० पडिवजमा० उक्क० अणंतगुण। तं कस्स ? संजदासंजद० सव्वविसुद्धस्स संजमं गेण्ह० पढमसमए होदि। ६४६. ००००००००००००००००००००००००००००००००००००००० ०००००००००००००००० अंतरं । एत्थ उवरिमाणि सामाइयच्छेदो० अपडिवादापडिवजडाणाणि । हेद्विमाणि परिहारसुद्धिसंजमस्स । तत्थ परिहारसुद्धिसंजद० जह० पडिवाद० अणंतगुणं । तं कस्स ? तप्पाओग्गसंकिलिट्ठस्स सामाइयच्छेदोवट्ठावणाहिमुहस्स चरिमसमए होदि । तस्सेव उक्क० अणंतगुणं । तं कस्म ? सव्वविसुद्धस्स परिहारसंजदस्स । सामाइयच्छेदोव० उक्क० संजद० अणंतगु० । तं कस्स ? सव्वविसुद्ध० से काले सुहुमसांपराय. संज० गाह० । एदेसिं जह० मिच्छत्तं गच्छ० सव्वसंकिलि० चरिमसमए भवदि । तेणेत्थ ण भणिदं । ४७. ०००००००००००००००००। अंतरं । सुहुमसांप० जह० पडिवाद० अणंतगु० । तं कस्स ? तप्पाओग्गविसुद्ध० अणियट्टि० अहिमुहस्स सुहम० । तस्सेव मनुष्यका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? जो शेष पाँच खण्डोंका निवासी मिथ्यादृष्टि मनुष्य तत्प्रायोग्य विशुद्ध होकर संयमको ग्रहण करता है उसके संयम ग्रहणके प्रथम समयमें होता है। संयमको ग्रहण करनेवाले उसीके उत्कृष्ट अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? जो संयतासंयत सर्वविशुद्ध होकर संयमको ग्रहण करता है उसके संयमको ग्रहण करनेके प्रथम समयमें होता है। उससे कर्मभूमिजका उत्कृष्ट प्रतिपद्यमान लब्धिस्थान अनन्तगुणा है । वह किसके होता है ? जो संयतासंयत सर्वविशुद्ध होकर संयम को ग्रहण करता है उसके संयम ग्रहणके प्रथम समयमें होता है। . ६४६. ०००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००० ०००। अन्तर । यहाँपर उपरिम अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमान स्थान सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धि संयत जीवके हैं। अधस्तन स्थान परिहारशुद्धि संयत जीवके होते हैं। उनमेंसे परिहारशुद्धि संयत जीवका जघन्य प्रतिपात स्थान पूर्व के स्थानसे अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? सामायिकछेदोपस्थापनाशुद्धिसंयमोंके अभिमुख हुए तत्प्रायोग्य संक्लिष्ट संयतके अन्तिम समयमें होता है। उससे उसीका उत्कृष्ट अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? सर्वविशुद्ध परिहारशुद्धिसंयतके होता है। उससे सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धि संयतका उत्कृष्ट अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? तदनन्तर समयमें सूक्ष्मसाम्परायशुद्धि संयमको ग्रहण करनेवाले सर्वविशुद्ध उक्त संयतके होता है। जो अगले समयमें मिथ्यात्वको प्राप्त करेंगे ऐसे सर्वसंक्लिष्ट इनके अन्तिम समयमें जघन्य स्थान होता है । इसलिये यहाँ उसका कथन नहीं किया। ४७. ००००००००००००००००० । अन्तर । उससे सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत का जघन्य प्रतिपातस्थान अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? अनिवृत्तिकरणके अभिमुख हुए तत्प्रायोग्य विशुद्ध सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयतके होता है। उससे उसीका उत्कृष्ट अनन्त
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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