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________________ १८० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [संजमलद्धी गच्छमाणस्स चरिमसमये भवदि । ००००००००००००००००००००। अंतरं । असंजदसम्मत्तं गच्छमाणस्स जह० अणंतगुणं । तं कस्स ? सव्वसंकिलिट्ठस्स । तस्सेव उक्क० अणंतगुणं । तं कस्स । तप्पाओग्गसंकिलिट्ठस्स चरिमसमए भवदि ।००००० ००००००००००००००० । अंतरं । संजमासंजमं गच्छमाण० जह० पडिवा० अणंतगुणं । तं कस्स ? सव्वसंकिलिट्ठ० । तस्सेव उक्क० अणंतगुणं । तं कस्स ? तप्पाओग्ग० संकिलिट्ठस्स चरिमसमए भवदि । ६४५. ००००००००००००००००००००००००००००००००००००००० अंतरं । कम्मभमि० संजमं पडिवज० जह० अणंतग । तं कस्स भरहक्खेत्तणिवासिं० मिच्छाइडिस्स संजमं गेण्ह० पढमसमय० । अकम्मभूमि० पडिवज० जह० अणंतअन्तिम समयमें होता है । ०००००००००००००००००००० । अन्तर । उससे असंयतसम्यक्त्व को प्राप्त होनेवाले संयतके जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? सर्व. संक्लिष्टके होता है। उससे उसीके उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? तत्प्रायोग्य संक्लिष्टके अन्तिम समयमें होता है। ००००००००००००००००००००। अन्तर । उससे संयमासंयमको ग्रहण करनेवाले संयतके जघन्य प्रतिपातस्थान अनन्तगुणा है। वह किसके होता है ? सर्वसंक्लिष्टके होता है। उससे उसीके उत्कृष्ट प्रतिपातस्थान अनन्तगुणा है । वह किसके होता है ? तत्प्रायोग्य संक्लिष्टके अन्तिम समयमें होता है। विशेषार्थ-संयम लब्धिस्थान तीन प्रकारके हैं यह पहले बतला आये हैं। उनमेंसे सबसे हीन लब्धिवाले प्रतिपात लब्धिस्थान हैं, क्योंकि संयमभावसे च्युत होनेवाले जीवोंके संक्लेशकी प्रचुरताके सद्भावसे ये स्थान प्राप्त होते हैं। वे प्रतिपातस्थान भी तीन प्रकारके हैं-गिरकर मिथ्यात्वको प्राप्त होनेवाले संयत जीवोंके प्रतिपातस्थान, गिरकर असंयतसम्यग्दृष्टिको प्राप्त होनेवाले संयत जीवोंके प्रतिपातस्थान और गिरकर संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले संयत जीवोंके प्रतिपातस्थान । इनके जघन्य प्रतिपातस्थानसे उत्कृष्ट प्रतिपातस्थानके अल्पबहुत्वका क्रम भी इसी क्रमसे है जिसका निर्देश मूलमें किया ही है। सबसे जघन्य प्रतिपातस्थान गिरकर मिथ्यात्वको प्राप्त होनेवाले संयत जीवोंके होता है । उत्कृष्ट प्रतिपातस्थान उन्हींके अन्तिम समयमें होता है। मध्यके उन्हींके असंख्यात लोक प्रमाण प्रतिपातस्थान इन दोनोंके बीचमें होते हैं। इन सब स्थानोंको यहाँ अंक संदृष्टिमें शून्यों द्वारा दिखलाया गया है। आगे अन्तर है। जो असंख्यात लोकप्रमाण लब्धिस्थानोंके बराबर है। अन्तर समाप्त होने पर पुनः जो प्रतिपात लब्धिस्थान प्राप्त होते हैं वे गिरकर असंयत सम्यक्त्वको प्राप्त होनेवाले संयत जीवों के होते हैं। जघन्यसे लेकर उत्कृष्ट तक ये भी असंख्यात लोकप्रमाण हैं । आगे उक्त प्रकारसे अन्तर है। अन्तर समाप्त होने पर पुनः प्रतिपात लब्धिस्थान प्राप्त होते हैं जो गिरकर संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले संयत जीवोंके होते हैं । इस प्रकार ये सब मध्यमें अन्तर सहित प्रतिपात संयमलब्धिस्थान जानने चाहिए। ४५. ०००००००००००००००००००००००००००००००००००००००। अन्तर। उससे संयमको प्राप्त होनेवाले कर्मभूमिज मनुष्यका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणा है । वह किसके होता है ? जो भरतक्षेत्रका निवासी मिथ्यादृष्टि मनुष्य संयमको ग्रहण करता है उसके संयम ग्रहणके प्रथम समयमें होता है। उससे संयमको ग्रहण करनेवाले अकर्मभूमिज
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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