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________________ गाथा ११५ ] संजम वित्तिसमये कज्जविसेसपरूवणा १६५ पडिवजमाणम्मि तिन्हं करणाणं संभवो अस्थि त्ति चे ? होउ णाम, इच्छामाणसादो । किंतु ण तस्सेह विवक्खा अस्थि, तप्परूवणाए दंसणमोहोवसामणाए देव अंतभूदत्तादो । संपहि एदेसिं दोन्हं करणाणं लक्खणविहासा च जहा संजमा - संजमलद्वी परूविदा तहा णिरवसेसमेत्थ वि कायव्वा, विसेसाभावादोत जाणावेमाणो अपणामुत्तमुत्तरं भणइ * अधापवत्तकरण-अपुव्वकरणाणि जहा संजमासंजमं पडिवज्जमाणस्स परूविदाणि तहा संजमं पडिवज्जमाणयस्स वि कायव्वाणि । १८. यत्थमे सुतं । तदो अधापवत्त - अपुव्वकरणाणं लक्खणादिपरूवणा पुव्वभंगेण णिरवसेसमेत्थ कायव्वा । तत्थ कीरमाण-कजभेदो च ठिदि - अणुभागखंडय - तब्बंधोसरणलक्खणो सवित्थरं परूवेयव्वो । तदो अपुव्वकरणद्धाए णिट्ठिदाए अप्पमादभावेण संजमं पडिवण्णस्स पढमसमय पहुडि अंतोमुहुत्तमेत्तकालमेयं ताणुवड्डीए संजमपरिणामो वढदित्ति परूवणट्ठमुत्तरमुत्तमाह * तवो पढमसमयसंजमप्पहूडि अंतोमुहुत्तद्धमणंतगुणाए चरितलदीए बड्डदि । शंका - अनादि मिध्यादृष्टिके उपशमसम्यक्त्वके साथ संयमको प्राप्त होते समय तीन करण होते हैं ? समाधान - होने दो, क्योंकि उसके तीनों करणोंका होना इष्ट है । किन्तु उसकी यहाँ विवक्षा नहीं है । उक्त प्ररूपणा दर्शन मोहोपशामनासम्बन्धी प्ररूपणा में ही अन्तर्भूत है । अब इन दोनों करणोंके लक्षणोंका विशेष व्याख्यान जिस प्रकार संयमासं यमलब्धि में कहा है उसी प्रकार उसका पूरा व्याख्यान यहाँ भी करना चाहिए, क्योंकि उससे इसमें कोई भेद नहीं है इस प्रकार इस बातका ज्ञान कराते हुए आगे के अर्पणासूत्रको कहते हैं * संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले जीवके जिस प्रकार अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्व - करणका कथन किया है उसी प्रकार संयमको प्राप्त होनेवाले जीवके भी प्ररूपण करना चाहिए । $ १८. यह सूत्र गतार्थं है । इसलिये अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्वकरणके लक्षणादिकी समस्त प्ररूपणा पहले के समान यहाँ पर करनी चाहिए। वहाँ स्थितिकाण्डक, अनुभागकाण्डक तथा स्थितिबन्धापसरणलक्षण किये जानेवाले नाना कार्य विस्तार के साथ कहने चाहिए । तत्पश्चात् अपूर्वकरणके समाप्त होने पर अप्रमादभाव से संयमको प्राप्त होनेवाले जीवके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त कालतक एकान्तानुवृद्धिसे संयमपरिणाम वृद्धिंगत होता है इस बात का कथन करनेके लिए आगेके सूत्रको कहते हैं * तत्पश्चात् संयम ग्रहणके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त कालतक अनन्त - गुणी चारित्रलब्धिसे वृद्धिको प्राप्त होता है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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