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________________ १६२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [संजमलद्धी ११. 'के असे झीयदे पुव्वं बंधेण उदएण वा' ति विहासा। तत्थ बंधबोच्छेदे उवसामगभंगादो पत्थि णाणत्तं । जो च थोवयरो विसेसो जाणिय वत्तव्यो । संपहि उदयवोच्छेदोवुच्चदे-पंचदंसणावरणीय-णिरय-तिरिक्ख-देवगदि-चदुजादिणामाणि वेउव्विय-आहारसरीर-तदंगोवंग-चदुआणुपुग्विणामाणि आदीवुजोव-थावर-सुहुम-अपजत्तसाहारणसरीरणामाणि णीचागोदं च एदाणि उदएण वोच्छिण्णाणि, एदेसिमेत्युदयसंभवाभावादो। १२. 'अंतरं वा कहिं किच्चा के के उवसामगो कहि' त्ति विहासा। तत्थ अंतरकरणमेत्थ ण संभवइ, वेदगपाओग्गमिच्छाइट्टिणा एत्थाहियारादो। तदो चेव उवसामणा वि णत्थिा । अधवा पुव्वबद्धाणमणुदयोवसामणा जहा संजमासंजमलद्धीए Ammm तदनुरूप स्थितियोंकी उदीरणा होती है। यह स्थिति उदीरणाका विचार है। अनुभागउदीरणाका विचार इस प्रकार है कि यहाँ निर्दिष्ट प्रशस्त प्रकृतियोंकी चतुःस्थानीय होती है जो बन्धस्थानसे अनन्तगुणी हीन होती है और अप्रशस्त प्रकृतियोंकी द्विस्थानीय होती है जो सत्त्वस्थानसे अनन्तगुणी हीन होती है। तथा इन्हीं प्रकृतियोंकी प्रदेश उदीरणा अजघन्य. अनुत्कृष्ट होती है। प्रकृति उदीरणाका स्पष्ट निर्देश मूलमें किया ही है। इतना अवश्य है कि जिस जीवके जिस समय जिन प्रकृतियोंकी उदीरणा होती है उसके उस समय उन्हीं प्रकृतियोंकी स्थिति, अनुभाग और प्रदेश उदीरणा होती है। 5 ११. के अंसे झीयदे पुव्वं बंधेण उदएण वा' इसकी विभाषा । उसमें बन्धव्युच्छित्तिके विषयमें उपशामकके समान भंग होनेसे कोई भेद नहीं है। और जो थोड़ा भेद है उसका जानकर कथन करना चाहिए । अब उदयव्युच्छित्तिको कहते हैं-पाँच दर्शनावरणीय, गांत, तियश्चगति, देवगति, चार जातिनाम, वैक्रियिकशरीर, आहारकशरीर, ये दोनों आंगोपांग, चार आनुपूर्वीनाम और नीचगोत्र ये उदयसे व्युच्छिन्न हैं, क्योंकि इनका यहाँपर उदय असम्भव है। विशेषार्थ-यहाँ पर उक्त जीवके किन प्रकृतियोंका बन्ध और उदय नहीं होता इसका स्पष्टीकरण किया गया है। दशनमोहके उपशामकके जिन प्रकृतियोंका बन्ध नहीं होता उनका इसके भी बन्ध नहीं होता। मात्र संयमके सन्मुख हुआ जीव नियमसे कर्मभूमिज मनुष्य ही होता है, अतः इसके नामकर्मकी देवगतिप्रायोग्य प्रकृतियोंका ही बन्ध होता है, मनुष्यगतिप्रायोग्य प्रकृतियोंका नहीं इतना विशेष जानना चाहिए । यहाँ पर जिन प्रकृतियोंका उदय नहीं होता उनका निर्देश मूलमें किया ही है। $ १२. 'अंतरं वा कहिं किच्चा के के उवसामगो कहिं' इसकी विभाषा। इसके अनुसार यहाँ अन्तरकरण सम्भव नहीं है, क्योंकि वेदकप्रायोग्य मिथ्यादृष्टिका यहाँ पर अधिकार है और इसीलिये उपशामना भी नहीं है । अथवा पूर्ववद्ध कर्मोंकी अनुदय-उपशा १. ता०प्रती अत्थि इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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