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________________ १६१ गाथा ११५] संजमपडिवत्तिसमये कजविसेसपरूवणा पविसंति । उत्तरपयडीओ वि जाओ अत्थि ताओ सव्वाओ पविसंति । णवरि जइ परभवियं देवाउअमस्थि तं ण पविसदि ति वत्तव्वं । एत्तिओ चेव विसेसो । ६१०. 'कदिण्हं वा पवेसगो' त्ति विहासा । मूलपयडीणं सव्वासिं पवेसगो। उत्तरपयडीणं पि पंचणाणावरणीय-चउदंसणावरणीय-मिच्छत्त-मणुस्साउ-मणुसगदि-पंचिदियजादि-ओरालिय०-तेजा-कम्मइयसरीर-ओरालियसरीरअंगोवंग-वण्ण-गंध-रस-फासअगुरुअलहुअ४-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिराथिर-सुभासुभ-णिमिण-उच्चागोद-पंचतराइयाणं णियमापवेसगो। सादासादाणमण्णदरस्स पवेसगो। चदुण्हं कसायाणं तिण्हं वेदाणं दोण्हं जुगलाणमण्णदरपवेसगो। भय-दुगुंछा० सिया पवेसगो। छण्णं संठाणाणं छण्णं संघडणाणमण्णदर० णियमा पवेसगो। दोविहायगदि-सुभग-दूभगसुस्सर-दुस्सर-आदेज-अणादेज-जसगित्ति-अजसगित्तीणमण्णदरपवेसगो। द्विदि-अणुभाग-पदेसाणं पि पवेसापवेसणं च जाणिय वत्तव्वं । हैं। उत्तर प्रकृतियाँ भी जो हैं वे सब प्रवेश करती हैं। इतनी विशेषता है कि यदि परभवसम्बन्धी देवायु है तो वह प्रवेश नहीं करती ऐसा कहना चाहिए । इतना ही विशेष है। विशेषार्थ—संयमके अभिमुख हुए वेदकप्रायोग्य मिथ्यादृष्टि जीवके आठों कर्मोकी सत्ता होती है, इसलिये वे सब उदयावलिमें प्रवेश करती हैं। तथा उदय-अनुदयरूप जितनी उत्तर प्रकृतियोंकी सत्ता है वे सभी उदयावलिमें प्रवेश करती हैं। मात्र जिसके परभवसम्बन्धी देवायुकी सत्ता है वह उदयावलिमें प्रवेश नहीं करती, क्योंकि उसका आबाधाकाल नियमसे मुज्यमान आयुप्रमाण पाया जाता है। ६ १०. 'कदिण्हं वा पवेसगो' इस पदकी विभाषा। मूल प्रकृतियोंका सबका प्रवेशक होता है। उत्तरप्रकृतियोंमें भी पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, मिथ्यात्व, मनुष्यायु, मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रियजाति, औदारिक-तैजस-कार्मणशरीर, औदारिकशरीरआंगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघुचतुष्क, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर-अस्थिर, शुभअशुभ, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँच अन्तराय इनका नियमसे प्रवेशक है । साता और असाता इनमेंसे अन्यतरका प्रवेशक है । चार कषाय, तीन वेद और दो युगलोंमेंसे अन्यतरका प्रवेशक है। भय और जुगुप्साका स्यात् प्रवेशक है। छह संस्थान और छह संहनन इनमेंसे अन्यतरका नियमसे प्रवेशक है । दो विहायोगति, सुभग-दुर्भग, सुस्वर-दुःस्वर, आदेय-अनादेय, तथा यशःकीर्ति-अयशःकीर्ति इनमेंसे अन्यतरका प्रवेशक है। स्थिति, अनुभाग और प्रदेशोंके भी प्रवेश और अप्रवेशको जानकर कथन करना चाहिए। विशेषार्थ यहाँ आयुकर्मके सिवाय शेष कर्मों की स्थिति अन्तःकोडाकोड़ी होती है, अतः तदनुरूप स्थितियोंकी उदीरणा होती है तथा आयुकर्मकी जो भुज्यमान स्थिति शेष हो, १. आ प्रती चदुर्दसणावरणीय-मिच्छत्तमणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टा तेजा-कम्मइयसरीरर- इति पाठः । ता०प्रतावपि पाठोश्यमव्यवस्थित एव ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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