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________________ १५२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [संजमासंजमलद्धी ___* तिरिक्खजोणियास पडिवजमाणयस्स उक्कस्सयं लट्ठिाणमणंतगुणं । 5 १०१. तं कस्स ? तिरिक्खासंजदसम्माइट्ठिस्स सव्वविसुद्धीए संजमासंजमं गेण्हमाणस्स पढमससए होइ । सेसं सुगमं । * मणुसस्स पडिवजमाणगस्स उक्कस्सयं लद्धिहाणमणंतगुणं । $ १०२. तं कस्स ? मणुस्सासंजदसम्माइट्ठिस्स सव्वविसुद्धस्स संजमासंजमं गेण्हमाणस्स पढमसमए होदि । सुगममण्णं । *मणुसस्स अपडिवजमाण-अपडिवदमाणयस्स जहण्णयं लट्ठिाणमणंतगुणं । 5 १०३. तं कस्स ? मिच्छाइद्विस्स तप्पाओग्गविसुद्धस्स संजमासंजमं पडिवण्णम्स विदियसमए होइ । सेसं सुगमं । अतिरिक्खजोणियस्स अपडिवजमाण-अपडिवदमाणयस्स जहण्णयं लद्धिट्ठाणमणंतगुणं । . * उससे प्रतिपद्यमान तिर्यञ्चयोनि जीवका उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणा है। ६१०१. शंका—वह किसके होता है ? समाधान-तिर्यच असंयत सम्यग्दृष्टिके सर्व विशुद्धिसे संयमासंजमको ग्रहण करनेके प्रथम समयमें होता है । शेष कथन सुगम है। * उससे प्रतिपद्यमान मनुष्यका उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणा है । $१०२. शंका-वह किसके होता है ? समाधान-सर्व विशुद्ध मनुष्य असंयत सम्यग्दृष्टिके संयमासंयमको ग्रहण करनेके प्रथम समय में होता है । अन्य कथन सुगम है। ____ * उससे अप्रतिपद्यमान-अप्रतिपतमान मनुष्यका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणा है। 5 १०३. शंका-वह किसके होता है ? समाधान-मिथ्यात्वसे संयमासंयमको प्राप्त हुए तत्प्रायोग्य विशुद्ध मनुष्यके दूसरे समयमें होता है। शेष कथन सुगम है। . * उससे अप्रतिपद्यमान-अप्रतिपतमान तिर्यश्चयोनि जीवका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणा है।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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