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________________ १५१ गाथा ११५ ] संजदासंजदे पदविसेसाणमप्पाबहुअपरूवणा $ ९८. एदं पि तप्पा ओग्गजहण्णसंकिलेसेण सासंजमसम्मत्तं पडिवज्जमाणस्स चरिमसमये चेत्र लद्धप्पलाहं । णवरि जादिविसेसवसेण तिरिक्खपडिवादपाओग्गुक्कस्सविसोहीदो मणुस संजदासंजदस्स पडिवादषाओग्गुक्कस्सविसोही अनंतगुणा जादा, पुविल्लादो असंखेजलोग मेत्तछट्टाणाणि उवरि चढिदूणेदिस्से समुप्पत्तिदंसणादो । * मणुसस्स पडिवज्जमाणगस्स जहण्णयं लद्धिट्ठाणमणंतगुणं । ९९. मणुसमिच्छाट्ठिस्स तप्पा ओग्गविसोहीए संजमा संजमं पडिवजमाणस्स पढमसमए एदं घेत्तव्वं । ण वेदस्स पुव्विल्लादो अनंतगुणत्तमसिद्धं, तत्तो असंखेजलगट्टाणाणि अंतरिदूणेदस्स समुप्पत्तीए अणंतरमेव निदरिसिणत्तादो । * तिरिक्खजोणियस्स पडिवज्जमाणगस्स जहण्णयं लद्धिद्वाणमणंत गुणं । $ १०० एदं पि मिच्छादिट्ठिस्स तप्पा ओग्गविसोहीए संजमासंजमं पडिवजमाणस्स पढमसमये चैव लद्वप्पसरूवं । किंतु जादिविसेसदो पुव्विल्लादो एदमणंतगुणं जाद, मणुसाणं व तिरिक्खजोणियाणं सव्वजहण्णसंकिलेस विसोहीणमसंभवादो, तपाओग्गजहण्णाणं चैव ताणं तत्थ संभवोवएसादो । $ ९८ यह भी तत्प्रायोग्य जघन्य संक्लेशसे असंयम के साथ सम्यक्त्वको प्राप्त होनेबाले मनुष्य के अन्तिम समय में ही आत्मलाभ करता है । इतनी विशेषता है कि जाति विशेषके कारण तिर्यंचोंके प्रतिपातके योग्य उत्कृष्ट विशुद्धिसे मनुष्य संयतासंयत के प्रतिपात के योग्य उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्वगुणी हो गई है, क्योंकि पूर्वके लब्धिस्थानसे असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थान ऊपर चढ़ कर इसकी उत्पत्ति देखी जाती है । * उससे प्रतिपद्यमान मनुष्यका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणा है । ९९. तत्प्रायोग्य विशुद्धिसे संयमासंयमको ग्रहण करनेवाले मनुष्य मिथ्यादृष्टि के प्रथम समयका यह लब्धिस्थान लेना चाहिए। इसका यह पूर्वके लब्धिस्थान से अनन्तगुणा होना असिद्ध नहीं है, क्योंकि उससे असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थानोंके अन्तरालसे इसकी उत्पत्ति होती है यह इससे पूर्व ही बतला आये हैं । * उससे प्रतिपद्यमान तिर्यञ्चयोनि जीवका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणा है। $ १००. यह भी तत्प्रायोग्य विशुद्धिसे संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले मिथ्यादृष्टि तिर्यञ्चके प्रथम समय में स्वरूपलाभ करता है । किन्तु जातिविशेषके कारण पूर्वके लब्धिस्थानसे यह अनन्तगुणा हो गया है, क्योंकि जिस प्रकार मनुष्योंके सबसे जघन्य संक्लेश और विशुद्धि होती है उस प्रकार तिर्यञ्चयोनि जीवके सबसे जघन्य संक्लेश और विशुद्धिका होना असम्भव है तथा तत्प्रायोग्य जघन्योंका ही उन दोनोंके वहाँ होनेका उपदेश पाया जाता है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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