SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 193
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १५० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [संजमासंजमलद्धी संकिलिट्ठस्स मिच्छत्तं गच्छमाणस्स चरिमसमये समुवलद्धसरूवत्तादो। * मणुसस्स पडिवदमाणयस्स जहण्णय लद्धिट्ठाणं तत्तियं चेव । $ ९५. सुगममेदं, ओघजहण्णलट्ठिाणादो मणुससंजदासंजदजहण्णपडिवादट्ठाणस्स मेदाभावमस्सियूण पयट्टत्तादो । ____ * तिरिक्खजोणियस्स पडिवदमाणयस्स जहण्णयं लद्धिट्ठाणमणंतगुणं। 5 ९६. कुदो ? पुब्विल्लादो असंखेज्जलोगमेत्तछट्ठाणाणि उवरि गंतूणेदस्स समुप्पत्तिदंसणादो। * तिरिक्खजोणियस्स पडिवदमाणयस्स उक्कस्सयं लद्धिट्ठाणमणंतगुणं । $९७. एदं तप्पाओग्गसंकिलेसेणासंजमं गच्छमाणस्स चरिमसमए घेत्तव्वं, वेदगसम्मत्ताणुविद्धमसजमं गच्छमाणस्स होइ ति भावत्थो। णेदस्स पुग्विल्लादो अणंतगुणत्तमसिद्धं, तत्तो असंखेज्जलोगमेत्तछट्ठाणाणि समुल्लंघियूण समुप्पण्णस्सेदस्स अणंतगुणत्तसिद्धीए णिव्वाहमुवलंभादो । ___ * मणुससंजदासंजदस्स पडिवदमाणगस्स उक्कस्सयं लद्धिट्ठाणमणंतगुणं । सबसे अधिक संक्लेश परिणामवाले संयतासंयतके अन्तिम समयमें उसकी उपलब्धि होती है। * गिरनेवाले मनुष्यका जघन्य लब्धिस्थान उतना ही है । $ ९५. यह सूत्र सुगम है, क्योंकि ओघ जघन्य लब्धिस्थानसे मनुष्य संयतासंयतके जघन्य प्रतिपातस्थानमें भेदपनेका आश्रय कर यह सूत्र प्रवृत्त हुआ है । * उससे गिरनेवाले तियंचयोनि जीवका जघन्य लब्धिस्थान अनन्तगुणा है। ६९६. क्योंकि पूर्वके लब्धिस्थानसे असंख्यात लोकप्रमाण षट्धान ऊपर जाकर इसकी उत्पत्ति देखी जाती है। * उससे गिरनेवाले तिर्यचयोनि जीवका उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणा है । . ९७. तत्प्रायोग्य संक्लेशसे असंयमको प्राप्त होनेवाले जीवके अन्तिम समय इसे ग्रहण करना चाहिये । वेदकसम्यक्त्वसे युक्त असंयमको प्राप्त होनेबाले जीवके यह होता है यह उक्त कथनका भावार्थ है । पहलेके लब्धिस्थानसे इसका अनन्तगुणापना असिद्ध नहीं है, क्योंकि असंख्यात लोकप्रमाण षस्थानोंको उल्लंघनकर उत्पन्न हुए इसकी अनन्तगुणपनेकी सिद्धि विना किसी बाधाके पाई जाती है। * उससे गिरनेवाले मनुष्य संयतासंयतका उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणा है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy