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________________ १४४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ संजमासंजमलद्धी एत्तो छविहाए वड्डीए सेसाणमजहण्णट्ठाणाणमसंखेजलोगमेत्ताणं सरूवणिदेसं कुणमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ * तदो विदियलद्धिट्ठाणमणंतभागुत्तरं । ६८६. पुविल्लजहण्णलद्धिट्ठाणं सव्वजीवरासिमेत्तभागहारेण खंडिय तत्थेयखंडे तम्मि चेव पडिरासीकयम्मि पक्खिते विदियं लद्धिट्ठाणमणंतभागुत्तरं होदण समुप्पजदि त्ति भणिदं होदि । अथवा जहण्णलाद्धिट्ठाणुप्पत्तिणिबंधणकसायुदयट्ठाणादो विदियलट्ठिाणुप्पत्तिणिबंधणं कसायुदयट्ठाणमणतेहि फद्दएहिं हीणं होइ । एदाणि च होणफयाणि सयलाणुभागट्ठाणस्स अणंतभागमेत्ताणि, सव्वजीवरासिणा जहण्णद्वाणम्मि खंडिदे तत्थेयखंडपमाणत्तादो। एवं च अणंतेसु अणुभागफद्दएसु हीणेसु तत्तो समुप्पजमाणविदियलद्धिट्ठाणं पि जहण्णलद्धिवाणादो अणंतेहिं फदएहिं अब्भहियं होदूण समुप्पजदि, हीणाणुभागफद्दएहिंतो समुप्पजमाणकजस्स वि उवयारेण तव्ववएसाविरोहादो। एसो अत्थो उवरि सव्वत्थ जोजेयव्वो। तदो सिद्धं जहण्णलद्धिट्ठाणादो विदियं लट्ठिाणमणंतरपरूविदेण पडिभागेणाणंतभागुत्तरमिदि । आगे छह प्रकारकी वृद्धिसे युक्त असंख्यात लोकप्रमाण शेष अजघन्य स्थानोंके स्वरूपका निर्देश करते हुए आगेके सूत्रको कहते हैं * उससे दूसरा लब्धिस्थान अनन्तवाँ भाग अधिक है। ६८६. पिछले जघन्य लब्धिस्थानको सब जीवराशिप्रमाण भागहारसे भाजित कर वहाँ प्राप्त एक भागको प्रतिराशिकृत उसी जघन्य लब्धिस्थानमें मिलानेपर उससे अनन्तवाँ भाग अधिक होकर दूसरा लब्धिस्थान उत्पन्न होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अथवा जघन्य लब्धिस्थानकी उत्पत्तिका कारणभूत जो कषाय-उदयस्थान है उससे दूसरे लब्धिस्थानकी उत्पत्तिका कारणभूत कषाय-उदयस्थान अनन्त स्पर्धकोंसे हीन होता है। और ये हीन स्पर्धक समस्त अनुभागस्थानके अनन्तवें भागप्रमाण हैं, क्योंकि जघन्य स्थानको समस्त जीवराशिसे भाजित करनेपर वहाँ वे हीन स्पर्धक एक खण्डप्रमाण प्राप्त होते हैं। इसप्रकार अनन्त अनुभागस्पर्धकोंके हीन होनेपर उससे उत्पन्न होनेवाला दूसरा लब्धिस्थान भी जघन्य लब्धिस्थानसे अनन्त स्पर्धक अधिक होकर उत्पन्न होता है, क्योंकि हीन अनुभागस्पर्धकोंसे उत्पन्न होनेवाले कार्यकी भी उपचारसे उक्त संज्ञाके होनेमें विरोधका अभाव है। यह अर्थ आगे सर्वत्र लगा लेना चाहिए। इसलिये सिद्ध हुआ कि जघन्य लब्धिस्थानसे दूसरा लब्धिस्थान अनन्तर पूर्व कहे गये प्रतिभागके अनुसार अनन्तवाँ भाग अधिक है। विशेषार्थ—पहले जघन्य लब्धिस्थानको अनन्त अविभागप्रतिच्छेदस्वरूप बतला आये हैं। इन अविभागप्रतिच्छेदोंमें सर्व जीवराशिप्रमाण अनन्तका भाग देनेपर जो एक भाग लब्ध आवे उतना उस जघन्य लब्धिस्थानमें जोड़नेपर दूसरा लब्धिस्थान प्राप्त होता है। इसका आशय यह है कि सबसे जघन्य संयमासंयमलब्धिस्थानमें जितनी विशुद्धि पाई जाती है उससे इस दूसरे लब्धिस्थानमें उक्त प्रमाणमें विशुद्धि वृद्धिंगत हो जाती है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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