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________________ गाथा ११५] संजदासंजदे पदविसेसाणमप्पाबहुअपरूवणा १४५ * एवं छठ्ठाणपदिदलद्धिट्ठाणाणि । 5 ८७. एवमेदेण कमेण छट्ठाणपदिदाणि लद्धिट्ठाणाणि परूवेयव्वाणि त्ति भणिदं होइ । तं जहा–जहण्णलद्धिट्ठाणादो अणंतभागवड्डिकंडयमंगुलस्स संखेजदिभागमेत्तं गंतूणासंखेजभागवड्डिहाणं होइ। तदो असंखेजभागवडिकंडयं' गंतूण संखेजभागवड्डी होइ । तदो संखेजभागवडिकंडयं गंतूण संखेजगुणवड्डिट्ठाणमुप्पजदि इच्चादि णेयव्वं जाव पढममणंतगुणवड्डिट्ठाणं समुप्पण्णं ति । ताधे कसायुदयट्ठाणमणंतगुणहीणं होइ, अणंतगुणहीणकसायुदयट्ठाणेण विणा अणतगुणसंजमासंजमलद्धिहाणाणुप्पत्तीदो। एदमेगं छट्ठाणं । एवंविहाणि असंखेजलोगमेत्ताणि छट्ठाणाणि पडिवादट्ठाणाणि । पडिवादवाणपडिबद्धाणि उन्लंघियण तदो पडिवजमाणपाओग्गाणि असंखेजलोगमेत्ताणि छट्ठाणाणि पुग्विन्लेहितो असंखेजगुणद्धाणपडिबद्धाणि । तत्तो वि असंखेजगुणाणि अपडिवादअपडिवजमाणपाओग्गाणि असंखेजलोगमेत्तछट्ठाणाणि णेदव्याणि जाव से काले संजमग्गाहयस्स सव्वुक्कस्सविसोहिट्ठाणं पज्जवसाणं कादण दूसरे शब्दोंमें इसीको यों भी कहा जा सकता है कि सबसे जघन्य लब्धिस्थानमें जितने स्पर्धकोंसे युक्त कषाय-उदयस्थान पाया जाता है उनके अनन्तवें भागहीन स्पर्धकोंसे युक्त कषाय-उदयस्थान दूसरे लब्धिस्थानमें होता है, क्योंकि जैसे-जैसे संयमासंयमलब्धिस्थानकी विशुद्धिमें वृद्धि होती है वैसे-वैसे कषाय-उदयस्थानमें स्पधकोंकी अपेक्षा हानि होती जाती है। यहाँ यद्यपि जघन्य लब्धिस्थानसे दूसरे लब्धिस्थानमें अनुभागस्पर्धकोंकी हानि हुई है, फिर भी इस दूसरे स्थानमें प्रथम स्थानसे जो लब्धिस्थानसम्बन्धी अविभागप्रतिच्छेद अधिक पाये जाते हैं उनमें स्पर्धकोंका आरोप करके उपचारसे जघन्य स्थानसम्बन्धी स्पर्धकोंसे द्वितीय स्थानसम्बन्धी स्पर्धक अनन्तवें भाग अधिक कहे हैं। * इसप्रकार षट्स्थानपतित लब्धिस्थान होते हैं । ६८७. इसप्रकार इस क्रमसे षट्स्थानपतित लब्धिस्थानोंका कथन करना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। यथा-जघन्य लब्धिस्थानसे अंगुलके संख्यातवें भागप्रमाण अनन्त. भागवृद्धिकाण्डक जाकर असंख्यातभागवृद्धिस्थान होता है। तत्पश्चात् असंख्यातभागवृद्धिकाण्डक जाकर संख्यातभागवृद्धि स्थान होता है। तत्पश्चात् संख्यातभागवृद्धिकाण्डक जाकर संख्यातगुणवृद्धिस्थान उत्पन्न होता है इत्यादि रूपसे प्रथम अनन्तगुणवृद्धिस्थान उत्पन्न होने तक ले जाना चाहिए। तब कषाय उदयस्थान अनन्तगुणा हीन होता है, क्योंकि अनन्तगुणहीन कषाय-उदयस्थानके बिना अनन्तगुणस्वरूप संयमासंयम लब्धिस्थानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । यह एक षट्स्थान है । इस प्रकार असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थान प्रतिपातस्थान हैं। प्रतिपातस्थानोंसे सम्बद्ध लब्धिस्थानोंका उल्लंघन कर असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थानपतित प्रतिपद्यमानस्थान हैं जो कि पिछले स्थानोंसे असंख्यातगुणे स्थानस्वरूप हैं, उनसे भी असंख्यातगुणे अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थानोंके योग्य असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थानपतितस्थान जानने चाहिए जो तदनन्तर समयमें संयमको ग्रहण करनेवाले जीवके १. ता०प्रतौ प्रायःसर्वत्र 'कंडय स्थाने' 'खंडय' पाठ उपलभ्यते ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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