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________________ १४२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे (संजमासंजमलद्धी ८२. पुव्वं जहण्णुकस्सलद्धीणमेव सामित्तप्पाबहुअमुहेण विणिण्णओ कओ। एत्तो असंखेजलोयभेयभिण्णाणमजहण्णाणुकस्सतव्वियप्पाणं जहण्णुक्कस्सलद्धिट्ठाणेहिं सह परूवणं कस्सामो त्ति पइण्णावक्कमेदं । ताणि च लद्धिट्ठाणाणि तिविहाणि होति-पडिवादट्ठाणाणि पडिवजमाणट्ठाणाणि अपडिवादापडिवजमाणद्वाणाणि चेदि । तत्थ जम्हि मिच्छत्तं वा असंजमं वा गच्छदि तं पडिवादट्ठाणं णाम । जम्हि संजमासंजमं पडिवजदि तं पडिवजमाणट्ठाणमिदि भण्णदे । सेसाणि संजमासंजमलद्धिट्ठाणाणि सत्थाणावट्ठाणपाओग्गाणि उवरिमगुणट्ठाणाहिमुहाणि च अपडिवादापडिवज्जमाणट्ठाणाणि ति णायव्वाणि । एत्थ सव्वत्थोवाणि पडिवादटाणाणि, पडिवजमाणट्ठाणाणि असंखेजगुणाणि अपडिवादापडिवजमाणट्ठाणाणि असंखेजगुणाणि । एदाणि सव्वाणि चेव घेत्तूण संजदासंजदलद्धिट्ठाणाणि होति । तेसिं परूवणट्ठमेत्थ तिण्णि अणिओगद्दाराणि परूवणा पमाणमप्पाबहुअं च । तत्थ तिविहाणं पि लद्धिट्ठाणाणं जहण्णट्ठाणप्पहुडि जावुक्कस्सलद्धिट्ठाणे त्ति ताव पुध पुध छवड्डिकमेण सरूवणिदेसो परूवणा ति भण्णदे। सा एत्थ पुव्वमणुगंतव्वा, पमाणप्पाबहुआणं तज्जोणित्तादो। * तं जहा। ६८३. पुच्छावकमेदं लद्धिट्ठाणपरूवणाविसयं सुगमं । $ ८२. पहले जघन्य और उत्कृष्ट लब्धियोंका ही स्वामित्व और अल्पबहुत्व द्वारा निर्णय किया। अब इससे आगे असंख्यात लोकप्रमाण भेदोंसे अनेक प्रकारके अजघन्यानुत्कृष्ट संयमासंयमलब्धिसम्बन्धी विकल्पोंका जघन्य और उत्कृष्ट लब्धिस्थानोंके साथ कथन करेंगे, इसप्रकार यह प्रतिज्ञावाक्य है। वे लब्धिस्थान तीन प्रकारके हैं-प्रतिपातस्थान, प्रतिपद्यमानस्थान और अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थान । उनमेंसे जिस स्थानके होनेपर यह जीव मिथ्यात्वको या असंयमको प्राप्त होता है वह प्रतिपातस्थान कहलाता है। जिस स्थानके होनेपर यह जीव संयमासंयमको प्राप्त होता है वह प्रतिपद्यमानस्थान कहलाता है तथा स्वस्थानमें अवस्थानके योग्य और उपरिम गुणस्थानके अभिमुख हुए शेष संयमासंयम लब्धिस्थान अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थान जानने चाहिए। यहाँ पर प्रतिपातस्थान सबसे थोड़े हैं। उनसे प्रतिपद्यमानस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थान असंख्यातगुणे हैं। इन सभीको ग्रहणकर संयतासंयतसम्बन्धी लब्धिस्थान होते हैं। उनका कथन करनेके लिये यहाँ पर तीन अनुयोगद्वार हैं-प्ररूपणा, प्रमाण और अल्पबहुत्व । उनमेंसे तीनों ही लब्धिस्थानोंसम्बन्धी जघन्य स्थानसे लेकर उत्कृष्ट लब्धिस्थान तक पृथक्षटूस्थानपतित छह वृद्धिक्रमसे स्वरूपका निर्देश करना प्ररूपणा कही जाती है। उसे यहाँ सर्वप्रथम जानना चाहिए, क्योंकि प्रमाण और अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा वह योनि है । * वे जैसे। $ ८३. लब्धिस्थानोंकी प्ररूपणाको विषय करनेवाला यह पृच्छावाक्य सुगम है।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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