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________________ १३४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ संजमासंजमलद्धी ___ * पढमसमयसंजदासंजदप्पहुडि जं एगंताणुवड्डीए वढदि चरित्ताचरित्तपजयेहिं एसो वढिकालो संखेजगुणो । ६५६. एसो वि एयंताणुवडिकालो अंतोमुहुत्तपमाणो चेव, किंतु संखेजसहस्समेत्तट्ठिदिखंडय-तब्बंधकालगब्भिणो, तेण संखेजगुणो जादो ५।। * अपुवकरणद्धा संखेजगुणा । ५७. को गुणगारो ? तप्पाओग्गसंखेजमेत्तरूवाणि ६ । एत्थाणियट्टिकरणद्धा णत्थि त्ति ण तव्विसयमप्पाबहुअचिंतणं कयं । * जहरिणया संजमासंजमद्धा सम्मत्तद्धा मिच्छत्तद्धा संजमद्धा असंजमद्धा सम्मामिच्छत्तद्धा च एदाओ छप्पि अद्धाओ तल्लाओ संखेजगुणाओ। ५८. कुदो एदासि छण्हं जहण्णद्धाणं सरिसत्तमवगम्मदे ? एदम्हादो चेव सुत्तादो। तदो एदाओ छप्पि अद्धाओ अण्णोण्णं समाणाओ होदूण अपुव्वकरणद्धादोः संखेज्जगुणाओ त्ति घेत्तव्वं ७ । * गुणसेढी संखेजगुणा । ५९. एत्थ गुणसेढि ति सामण्णणिद्द से वि पयरणवसेण संजमासंजम * उनसे संयतासंयतके प्रथम समयसे लेकर एकान्तानुवृद्धिके द्वारा चारित्राचारित्रपर्यायरूपसे जो वृद्धि होती है वह वृद्धिकाल संख्यातगुणा है।। $ ५६. यह एकान्तानुवृद्धिकाल भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण ही है, क्योंकि इस कालमें संख्यात हजार स्थितिकाण्डककाल और स्थितिबन्धकाल होते हैं, इसलिये वह संख्यातगुणा हो जाता है । * उससे अपूर्वकरणका काल संख्यातगुणा है । ६५७. गुणकार क्या है ? तत्प्रायोग्य संख्यात अंक गुणकार है ६ । यहाँ पर अनिवृत्तिकरणकाल नहीं है, इसलिए तद्विषयक अल्पबहुत्वका विचार नहीं किया। * उससे जघन्य संयमासंयमकाल, सम्यक्त्वकाल, मिथ्यात्वकाल, संयमकाल, असंयमकाल और सम्यग्मिथ्यात्वकाल ये छह काल परस्पर तुल्य होकर संख्यातगुणे हैं। ६५८. शंका-इन छहोंके जघन्य कालका सदृशपना कैसे जाना जाता है ? " समाधान-इसी सूत्रसे जाना जाता है । इसलिए ये छहों काल परस्पर सदृश होकर अपूर्वकरणके कालसे संख्यातगुणे हैं ऐसा ग्रहण करना चाहिए ७ । . * उनसे गुणश्रेणि संख्यातगुणी है । $ ५९. यहाँ पर गुणश्रेणि ऐसा सामान्य निर्देश करने पर भी प्रकरणवश संयमासंयम
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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