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________________ १२५ गाथा ११५ ] संजदासंजदस्स कज्जविसेस परूवणा मोट्टियूण गुणसेढिणिक्खेवं कुणमाणो उदयावलियन्भंतरे असंखेज्जलोगपडिभागियं दव्वं गोवच्छायारेण णिक्खविपूण तदो उदयावलियबाहिराणंतरद्विदीए असंखेजे समयपबद्धे णिसिंचदि । तत्तो उवरिमाणंतरट्ठिदीए असंखेजगुणं णिसिंचदि । एवमसंखेजगुणre सेटीए णिसिंचमाणो गच्छड जाव अंतोमुहुत्तमुवरिं गंतूण गुणसेढिसीसयं जादं ति । तदो असंखेज्जगुणहीणं । तत्तो विसेसहीणं जाव चरिमट्ठिदिमइच्छावणावलियमेत्तेण अपत्तोति । तदो एवंविहो गुणसेढिणिक्खेवो एत्थ पारद्धो ति सुत्तत्थणिच्छओ । * से काले तं चैव विदिखंडयं, तं चैव अणुभागखंडयं, सो चेव हिदिबंधो, गुणसेढी असंखेज्जगुणा । ३८. डिदि - अणुभागखंडयट्ठिदिबंधेसु ताव णत्थि णाणत्तं, पढमसमयाढत्ताणमेव तेसिमंतोमुत्तमेत्तसगुक्कीरणकालम्भंतरे अवट्ठिदभावेण पवृत्तिदंसणादो । गुणसेढी पुण अण्णारिसी होइ, पढमसमयोकट्टिदसमयपबद्धेहिंतो असंखेञ्जगुणेण समयपबद्धे ओड्डियूण विदियसमए गुणसेढीए णिक्खेवदंसणदो । संपहि एत्थ गुणसेढिणि क्खेवो किं गलिदसेसायामो आहो अवट्टिदो त्ति एदस्स णिण्णयकरणमुत्तरमुत्तं - * गुणसेढिणिक्खेवो अवट्टिदगुणसेढी तत्तिगो चेव । द्रव्यका अपकर्षण कर गुणश्रेणिनिक्षेप करता हुआ उदद्यावलिके भीतर असंख्यात लोकका भाग देने पर जो भाग लब्ध आवे उतने द्रव्यको गोपुच्छाकारसे निक्षिप्त कर उसके बाद उदयावलिके बाहर अनन्तर स्थितिमें असंख्यात समयप्रबद्धोंका सिंचन करता है । पुनः उससे उपरिम अनन्तर स्थिति में असंख्यातगुणे द्रव्यका सिंचन करता है । इस प्रकार अन्तमुहूर्त ऊपर जाकर गुणश्रेणिशीर्षके प्राप्त होने तक असंख्यात गुणित श्रेणिरूपसे सिंचन करता हुआ जाता है । तदनन्तर उपरिम स्थितिमें असंख्यातगुणे हीन द्रव्यका सिंचन करता है । इसके बाद अतिस्थापनावलिसे पूर्व अन्तिम स्थितिके प्राप्त होने तक उत्तरोत्तर विशेषहीन द्रव्यका सिंचन करता है । इस तरह इस प्रकारका गुणश्रेणिनिक्षेप यहाँ पर प्रारम्भ किया यह सूत्र के अर्थका निश्चय है । * तदनन्तर समयमें वही स्थितिकाण्डक, वही अनुभागकाण्डक और वही स्थितिबन्ध होता है । मात्र गुणश्रेणि असंख्यातगुणी होती है । $ ३८. यहाँ स्थितिकाण्डक, अनुभागकाण्डक और स्थितिबन्धमें तो भेद नहीं है, क्योंकि प्रथम समय में आरम्भ किये गये उन्हीं सबकी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण उत्कीरण कालके भीतर अवस्थितरूपसे प्रवृत्ति देखी जाती है । परन्तु गुणश्रेणि अन्य प्रकारकी होती है, क्योंकि प्रथम समय में अपकर्षित किये गषे समयप्रबद्धोंसे असंख्यातगुणे समयप्रबद्धों का अपकर्षण कर दूसरे समय में गुणश्रेणि में निक्षेप देखा जाता है । अब यहाँ पर गुणश्रेणिनिक्षेप क्या गलित शेष आयामवाला होता है या अवस्थित होता है इस प्रकार इस बातका निर्णय करनेके लिये आगेका सूत्र आया है * गुणश्रेणिनिक्षेप अवस्थित गुणश्रेणि होनेसे उतना ही होता है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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