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________________ गाथा ११५ संजमासंजमगुणपडिवत्तिणिहसो १२३. ३३. संपहि एवंविहमपुव्वकरणद्धं बोलेगण से काले सव्वविसुद्धो संजमासंजमं पडिवज्जदि ति पदुप्पाएमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ * तदो से काले पढमसमयसंजदासंजदो जादो । ३४. पुचिल्लमसंजमपञ्जायं छंडियण देससंजमपजांएण एसो जीवो करणादिलद्धिवसेण परिणदो त्ति भणिदं होइ । एवं संजदासंजदभावं पडिवन्जिय तप्पढमसमयप्पहुडि पुणो वि पडिसमयमणंतगुणाए संजमासंजमविसोहीए वड्डमाणस्स तदवत्थाए विशेषार्थ-यहाँ प्रथमोपशम सम्यक्त्वके साथ जो जीव संयमासंयमको ग्रहण करता है उसकी चर्चा नहीं है। वेदकसम्यग्दृष्टि या वेदक प्रायोग्य कालके भीतर स्थित जो मिथ्यादृष्टि जीव संयमासंयमको प्राप्त करता है उसकी चर्चा है। ऐसा जीव अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्वकरण इन दो करणोंको करके तदनन्तर नियमसे संयतासंयत हो जाता है ऐसे जीवके अपूर्वकरणमें कितने कार्य विशेष होते हैं यह यहाँ पर बतलाते हुए कहा गया है कि जैसे प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके समय अपूर्वकरणकालके भीतर हजारों स्थितिकाण्डकघात और हजारों स्थितिबन्ध तथा प्रत्येक स्थितिकाण्डक कालके भीतर हजारों अनुभागकाण्डकघात होते हैं उसी प्रकार यहाँ भी जान लेना चाहिए । एक-एक स्थितिकाण्डकका ल अन्तर्महर्त है पर उत्तरोत्तर यह कम होता गया है। स्थितिबन्धका काल स्थितिकाण्डकके कालके ही समान है । अतः जिस समय एक स्थितिकाण्डकका घात पूरा होता है उसी समय एक स्थितिबन्धका काल भी सम्पन्न हो जाता है। यहाँ जघन्य स्थितिकाण्डकका प्रमाण पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण है और उत्कृष्ट स्थितिकाण्डकका प्रमाण सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण है। जो अन्तर्मुहूर्त काल तक एक समान स्थितिबन्ध होता रहता है उससे पिछले स्थितिबन्धका काल समाप्त होने पर अगला स्थितिबन्ध पल्योपमका संख्यातवाँ भाग न्यून होता है। अनुभागकाण्डकघात अप्रशस्त कर्मोंका ही होता है, प्रशस्त कर्मोंका नहीं। उसमें भी यह जीव एक अनुभागकाण्डक कालके भीतर अनन्त बहभागप्रमाण अनुभागका घात कर लेता है। ऐसे हजारों अनुभागकाण्डकघात एक स्थितिकाण्डककालके भीतर सम्पन्न हो लेते हैं। नया स्थितिकाण्डकघात प्रारम्भ होनेके समय नया स्थितिबन्ध और नया अनुभाग काण्डकघात प्रारम्भ होता है। यहाँ अपूर्वकरणमें गुणश्रेणिरचना नहीं होती। जो संयमासंयमसम्बन्धी उदयावलिबाह्य अवस्थित गुणश्रेणि रचना होती है वह संयमासंयमके प्राप्त होने पर उसके प्रथम समयसे ही प्रारम्भ होती है। इस प्रकार इतनी विशेषताओंके साथ अपूर्वकरण सम्पन्न होता है। ३३. अब इस प्रकारके अपूवकरणसम्बन्धी कालको व्यतीत कर तदनन्तर समयमें सर्वविशुद्ध होकर संयमासंयमको प्राप्त करता है इस बातका कथन करते हुए आगेके सूत्रको कहते हैं * इसके बाद तदनन्तर समयमें वह प्रथम समयवर्ती संयतासंयत हो जाता है। $ ३४. पहलेकी असंयम पर्यायको छोड़कर यह जीव करण आदि लब्धियोंके कारण संयमासंयमरूप पर्यायसे परिणत होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इस प्रकार संयमासंयमभावको प्राप्त कर उसके प्रथम समयसे लेकर फिर भी प्रति समय अनन्तगुणी संयमा
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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