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________________ अधापत्तकरणे कज्जवि से सपरूवणा ११९ कंडयचरिमसमयउक्कस्सविसोहीदो अनंतगुणा जादा ति । एवं णिव्वग्गणकंड यमंतोमुहुत्तं धुवं काढूण जहण्णुक्कस्स विसोहीण मेगंतरिदसरूवेणप्पा बहुअमणुगंतव्वं जाव अधापवत्तकरणचरिमसमए जहण्णविसोही अंतोमुहुत्तं हेट्ठा ओसरितॄण द्विददुचरिमणिव्वग्गणकंडय चरिय समयउक्कस्स विसोहीदो अनंतगुणा जादा ति । तदो उवरिमसमए उक्कस्सिया विसोही अनंतगुणा । एवमुक्कस्सिया विसोही णेदव्वा जाव अधापवत्तकरणचरिमसमओ ति । एदं अधापवत्तकरणस्स लक्खणं । $ २३. संपहि चरिमसमय अधापवत्तकरणे चत्तारि सुत्तगाहाओ विहासियव्वाओ । तं जहा - संजमा संजमं पडिवज्जमाणस्स परिणामो केरिसो भवे १, काणि वा पुव्यबद्धाणि २, के अंसे झीयदे पुत्रं ३, किंट्ठिदियाणि कम्माणि ४ । एदासिं च विहासा सुगमा ति सुत्तारेण णाढत्ता । तदो एदासिं चउन्हं सुत्तगाहाण मत्थविहासा सवित्थरमेत्थ कायव्वा । $ २४. तदो अधापवत्तकरणे समत्ते अपुव्यकरणविसयं परूवणापबंधमाढवेमाणो इदमाह जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी प्राप्त होने तक ले जाना चाहिए । इस प्रकार निर्वर्गणाकाण्डप्रमाण अन्तर्मुहूर्त को ध्रुव करके जघन्य और उत्कृष्ट विशुद्धियोंका एक निर्वर्गणाकाण्डक के अन्तराल से अल्पबहुत्व तब तक ले जाना चाहिए जब जाकर अधःप्रवृत्त करणके कालसे अन्तर्मुहूर्त नीचे उतर कर स्थित हुए द्विचरम निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी उत्कृष्ट विशुद्धिसे अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समय में प्राप्त जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी हो जाती है । उससे उपरिम समयकी उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी है । इस प्रकार अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयके प्राप्त होने तक उत्कृष्ट विशुद्धि ले जानी चाहिए। यह अधःप्रवृत्तकरणका लक्षण है विशेषार्थ — अधःप्रवृत्तकरण में विशुद्धिकी तीव्र मन्दता किस प्रकार होती है इसका विवेचन यहाँ किया गया है। इस विषयका विशेष स्पष्टीकरण पुस्तक १२ में ( पृ० २४५ से लेकर पृ० २५२ तक ) कर आये हैं, इसलिये इसे वहाँसे जान लेना चाहिए । $ २३. अब अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समय में चार सूत्रगाथाओंका विशेष व्याख्यान करना चाहिए । यथा - संजमा संजमं पडिवज्ज माणस्स परिणामो केरिसो भवे । १. । काणि वा पुवबद्धाणि । २. । के अंसे झीयदे पुव्वं । ३. । किं ट्ठिदियाणि कम्माणि । ४. । ये चार सूत्र गाथाएं हैं। इनका विशेष व्याख्यान सुगम है, इसलिए सूत्रकारने इनका व्याख्यान नहीं किया । अतः इन चारों सूत्रगाथाओं का विशेष व्याख्यान विस्तार के साथ करना चाहिए । गाथा ११५ ] - विशेषार्थ - जिस प्रकार दर्शनमोहके उपशामकके और दर्शनमोह क्षपकके यथास्थान इन चार गाथाओंके अनुसार यथायोग्य व्याख्यान कर आये हैं उसी प्रकार यहाँ संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले जीवके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समय में उक्त चार गाथाओंके अनुसार विशेष व्याख्यान करना चाहिए | $ २४. इसके बाद अधः प्रवृत्तकरणके समाप्त होनेपर अपूर्वकरणविषयक प्ररूपणाप्रबन्धका आरम्भ करते हुए इस सूत्र को कहते हैं
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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