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________________ ११८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [संजमासंजमलद्धी २०. किं कारणं ? अधापवत्तकरणद्वाए संखेज्जभागमेत्तणिव्वग्गणकंडयभंतरे जहण्णविसोहीणं चेव अणंतगुणकमेण पवुत्तीए णिव्याहमुवलंभादो । * तदो पढमसमए उक्कस्सिया विसोही अणंतगुणा । २१. तदो णिव्वग्गणकंडयमेत्तमुवरि गंतूण द्विदजहण्णविसोहीदो एदिस्से पढमसमयुक्कस्सविसोहीए असंखेज्जलोगमेत्तछट्ठाणाणि समुल्लंघिय समुप्पत्तिदंसणादो। * सेसअधापवत्तकरणविसोही जहा दसणमोहउवसामगस्स अधापवत्तकरणविसोही तहा चेव कायव्वा । $ २२. संपहि एदीए अप्पणाए सूचिदत्थस्स फुडीकरणं कस्सामो । तं जहापढमसमये उक्कस्सियादो विसोहीदो जम्हि जहणिया विसोही णिद्विदा, तदो उवरिमसमए जहणिया विसोही अणंतगुणा, विदियसमए उक्कस्सिया विसोही अणंतगुणा । एवं णेदव्वं जाव विदियणिव्यग्गणकंडयचरिमसमयजहण्णविसोही पढमणिव्वग्गणकंडयचरिमसमयउक्कस्सविसोहीदो अणंतगुणा जादा ति । तदो विदियणिव्वग्गणकंडयपढमसमयउक्कस्सिया विसोही अणंतगुणा । एवं जहण्णुक्कस्सविसोहीओ' ढोएदूण णेदव्वं जाव तदियणिव्यग्गणकंडयचरिमसमयजहण्णविसोही विदियणिव्वग्गण २०. क्योंकि अधःप्रवृत्तकरणके कालके संख्यातवें भागप्रमाण निर्वर्गणाकाण्डकके भीतर जघन्य विशुद्धियोंकी ही अनन्तगुणितक्रमसे प्रवृत्ति निर्बाध पाई जाती है। * उससे प्रथम समयकी उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी है । २१. तदो अर्थात् निर्वर्गणाकाण्डकमात्र ऊपर जाकर वहाँ स्थित जघन्य विशुद्धिसे इस प्रथम समयसम्बन्धी उत्कृष्ट विशुद्धिकी असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थानोंको उल्लंघनकर समुत्पत्ति देखी है। * जिस प्रकार दर्शनमोह-उपशामकके अधःप्रवृत्तकरणसम्बन्धी विशुद्धियाँ होती हैं उसीप्रकार यहाँ शेष अधःप्रवृत्तकरणसम्बन्धी विशुद्धियाँ करनी चाहिए । $ २२. अब इसकी अर्पणाके द्वारा सूचित हुए अर्थका स्पष्टीकरण करेंगे। यथाप्रथम समयमें प्राप्त उत्कृष्ट विशुद्धिसे जिस स्थानमें जघन्य विशुद्धि समाप्त हुई है. उससे उपरिम समयमें प्राप्त जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी है। उससे दूसरे समयमें प्राप्त उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी है। इसी प्रकार दूसरे निर्वर्गणा काण्डकके अन्तिम समयकी जघन्य विशुद्धि प्रथम निवर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी उत्कृष्ट विशुद्धिसे अनन्तगुणी प्राप्त होने तक ले जाना चाहिए। उससे अर्थात् द्वितीय निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी जघन्य विशुद्धिसे द्वितीय निर्वर्गणाकाण्डकके प्रथम समयकी उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी है। इस प्रकार जघन्य और उत्कृष्ट विशुद्धियोंको ग्रहण कर द्वितीय निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी उत्कृष्ट विशुद्धिसे तृतीय निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी १. ता०प्रती -विसोहीए इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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