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________________ गाथा ११५ ] अधापवत्त करणे कज्जविसेसपरूवणा ११७ विसोहीणमणुक्कट्टि लक्खणाणं तिव्व-मंददाए किंचि अणुगमं कुणमाणो सुत्तकलाव मुत्तरं भणइ * विसोहीए तिब्व- मंदं वत्तइस्सामो । $ १६. सुगममेदं पयदपरूवणाविसयं पइण्णाबक्कं । * अधापवत्तकरणस्स जदो पहुडि विसुद्धो तस्स पढमसमए जहरिया विसोही थोवा । $ १७ किं कारणं १ अधापवत्तकरणपढमसमयपाओग्गाण मसंखेजलोगमेत्तपरिणामाणं छवड्डीए समवट्ठिदाणं सव्वजहण्ण परिणामट्टाणस्सेह विवक्खियत्तादो | * विदियसमए जहरिणया विसोही अांतगुणा । १८. कुदो ? पढमसमयजहण्णपरिणामादो असंखेज लोग मेत्तछट्टाणि गंतूणेदिस्से विसोही समवट्ठाण दंसणा दो । * तदियसमए जहरिणया विसोही अनंतगुणा । $ १९. एत्थ वि कारणमणंतरपरूविदमेव । * एवमंतोमुहुत्तं जहण्णिया चेव विसोही अनंतगुणेण गच्छइ । चाहिए, क्योंकि उससे इसमें कोई भेद नहीं है । अब अधःप्रवृत्तकरणकी अनुकृष्टि लक्षणवाली विशुद्धियों की तीव्र- मन्दताका कुछ अनुगम करते हुए आगेके सूत्रकलापको कहते हैं* अब विशुद्धिके तीव्र- मन्दभावको बतलावेंगे । $ १६. प्रकृत प्ररूपणाको विषय करनेवाला यह प्रतिज्ञावाक्य सुगम है । ** अधःप्रवृत्तकरण जीव जहाँसे लेकर विशुद्ध हुआ है उसके प्रथम समय में जघन्य विशुद्धि स्तोक है । $ १७. क्योंकि अधः प्रवृत्तकरणके प्रथम समयके योग्य छह वृद्धिरूप से अवस्थित असंख्यात लोकप्रमाण परिणामोंमेंसे सबसे जघन्य परिणामस्थान यहाँ पर विवक्षित है । * उससे दूसरे समय में जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी है । $ १८. क्योंकि प्रथम समयके जघन्य परिणाम से असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थान जाकर इस विशुद्धिका अवस्थान देखा जाता है । * उससे तीसरे समय में जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी है । $ १९. यहाँपर भी अनन्तर पूर्वका कहा हुआ ही कारण है । * इस प्रकार अन्तर्मुहूर्तकाल तक जघन्य विशुद्धि ही प्रति समय अनन्तगुणी अनन्तगुणी बढ़ती जाती है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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