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________________ गाथा ११५] अधापवत्तकरणस्स पुव्वं कजविसेसपरूवणा $ १३. एदस्स सुत्तस्सत्थो वुच्चदे- वेदगपाओग्गमिच्छाइट्ठी ताव संजमासंजमं पडिवजमाणो पुन्यमेव अंतोमुहुत्तमत्थि त्ति सत्थाणपाओग्गाए विसोहीए पडिसमयमणंतगुणाए विसुज्झमाणो आउगवजाणं सव्वेसिमेव कम्माणं द्विदिबंधं हिदिसंतकम्म च अंतोकोडाकोडीए करेदि । कुदो ? तकालभाविविसोहिपरिणामाणं तत्तो उवरिमढिदिबंध-डिदिसंतकम्मेहि विरुद्धसहावत्तादो, तेसिं तहाभावेण विणा संजमासंजमगुणग्गहणाणुववत्तीदो च । एदं ताव एकं पयदविसोहिणिबंधणं फलं । अण्णं च सुहाणं कम्माणं सादादीणमणुभागबंधमणुभागसंतकम्मं च चदुट्ठाणियं करेदि, तदणुभागस्स सुहपरिणामणिबंधणत्तादो । असुभाणं पुण कम्माणं पंचणाणावरणादीणं अणुभागबंधमणुभागसंतकम्मं च णियमा विट्ठाणियं करेदि, विसोहिपरिणामेहितो तेसिमणुभागस्स तत्तो उवरिमस्स घादोववत्तीदो। तदो सिद्धमंतोमुहुत्तपबद्धाए सत्थाणविसोहीए विसुज्झमाणो वेदगपाओग्गमिच्छाइट्ठी संजमासंजमाहिमुहो सव्वो सव्वेसिं कम्माणमाउगवजाणं द्विदिबंध-द्विदिसंतकम्माणि अंतोकोडाकोडीए ठविय पसत्थापसत्थपयडीणमणुभागबंध-संतकम्माणि च चउट्ठाण-विट्ठाणसरूवाणि कादूण तदो संजमासंजमलद्धीए अहिमुहीभावं पडिवाइ, णाण्णहा ति । एवं वेदगसम्माइट्ठिस्स वि असंजदस्स संजमासंजमं पडिवजमाणस्स अंतोमुहुत्तपडिबद्धो विसोहिपरिणामो अणुगंतव्यो। १३. इस सूत्रका अर्थकहते हैं-संयमसंयमको प्राप्त होनेवाला वेदकप्रायोग्य मिथ्यादृष्टि जीव पहले ही अन्तर्मुहूर्त काल रहने पर स्वस्थानके योग्य प्रति समय अनन्तगुणी विशुद्धिके द्वारा विशुद्धिको प्राप्त हुआ आयुकर्मको छोड़कर सभी कर्मों के स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्मको अन्तःकोड़ाकोड़ीके भीतर करता है, क्योंकि उस काल में होनेवाले विशुद्धिरूप परिणाम उससे उपरिम स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्मके विरुद्ध स्वभाववाले होते हैं और उनके उस प्रकारके हुए बिना संयमासंयमगुणकी, प्राप्ति नहीं बन सकती। प्रकृत विशुद्धिके निमित्तसे होनेवाला यह एक फल है। दूसरा फल यह है कि साता आदि शुभ कर्मों के अनुभागबन्ध और अनुभागसत्कर्मको चतुःस्थानीय करता है, क्योंकि उनका अनुभाग शुभ परिणामनिमित्तक होता है। परन्तु पाँच ज्ञानावरणादि अशुभ कर्मों के अनुभागबन्ध और अनुभागसत्कर्मको नियमसे द्विस्थानीय करता है, क्योंकि विशुद्धिरूप परिणामोंके निमित्तसे उन कोंके उससे ऊपरके अनुभागका घात हो जाता है । इसलिए सिद्ध हुआ कि अन्तर्मुहूर्त काल सम्बन्धी स्वस्थान विशुद्धिके द्वारा विशुद्ध होता हुआ संयमासंयमके अभिमुख हुआ सब वेदक प्रायोग्य मिथ्यादृष्टि जीव आयुकर्मको छोड़कर सभी कोंके स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्मको अन्तःकोडाकोड़ीके भीतर स्थापित कर प्रशस्त प्रकृतियोंके अनुभागबन्ध और अनुभागसत्कर्मको चतुःस्थानस्वरूप करके और अप्रशस्त प्रक्रतियोंके अनुभागबन्ध और अनुभागसत्कर्मको द्विस्थानस्वरूप करके तदनन्तर संयमासंयमलब्धिके अभिमुखपनेको प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं। इसी प्रकार संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले वेदकसम्यग्दृष्टि असंयत जीवके भी अन्तर्मुहूर्त काल तक होनेवाला विशुद्धिपरिणाम जानना चाहिए।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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