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________________ ११४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [संजमासंजमलद्धी अधापवत्तापुव्वसण्णिदाणि संभवंति, ण तइजमणियट्टिकरणमत्थि, दोहिं चेव करणेहिं एत्थ पयदत्थसिद्धीए। जत्थ कम्माणं सव्वोवसामणा णिम्मूलक्खओ वा कीरदे तत्थेवाणियट्टिकरणस्सावयारो। ण देसोवसामणासाहणिजे संजमासंजमपडिलंभे । तदो दोण्हमेव करणाणमेत्थ संभवो, णाणियट्टिकरणस्से त्ति । १२. संपहि दोण्हमेदेसि करणाणं जहागममणुगमं कुणमाणो तत्थ ताब अधापवत्तकरणादो हेट्ठा चेव अंतोमुहुत्तपडिबद्धाए सत्थाणविसोहीए द्विदि-अणुभागाणमोवट्टणमेवं होइ त्ति पदुप्पायणमुत्तरसुत्तमोइण्णं____ * संजमासंजममंतोमहुत्तेण लभिहिदि ति तदो पहुडि सव्वो जीवो आउगवजाणं कम्माणं हिदिबंध हिदिसंतकम्मं च अंतोकोडाकोडीए करेदि, सुभाणं कम्माणमणुभागबंधमणुभागसंतकम्मच चदुट्ठाणियं करेदि, असुभाणं कम्माणमणभागबंधमणभागसंतकम्मं च दुहाणियं करेदि । बतलावेंगे। वहाँ अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्वकरण ये दो ही करण होते हैं, तीसरा अनिवृत्तिकरण नहीं होता, क्योंकि दो ही करणोंसे यहाँ पर प्रकृत अर्थकी सिद्धि हो जाती है । जहाँ पर कर्मोंकी सर्वोपशामना की जाती है या निर्मल क्षय किया जाता है वहीं पर अनिवत्तिकरणका अवतार होता है, देशोपशामनासाध्य संयमासंयमकी प्राप्तिमें नहीं। इस लिए यहाँ पर दो ही करण सम्भव हैं, अनिवृत्तिकरण नहीं। विशेषार्थ-प्रथमोपशम सम्यक्त्वके साथ जो जीव संयमासंयमको प्राप्त करते हैं वहाँ अवश्य अधःप्रवृत्तकरण आदि तीन करण होते हैं, किन्तु जो वेदक सम्यग्दृष्टि जीव संयमासंयमको प्राप्त करते हैं या वेदक कालके भीतर अवस्थित मिथ्यादृष्टि जीव वेदक सम्यक्त्वके साथ संयमासंयमको प्राप्त करते हैं उनके अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्वकरण ये दो ही प्रकारके कारण परिणाम होते हैं। जब यह जीव दर्शनमोहनीयकी करणोपशमना, चारित्रमोहनीयकी करणपूर्वक सर्वोपशमना तथा दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीयकी क्षपणा करता है तब अनिवृत्तिकरण परिणाम होता है। यहाँ चारित्रमोहनीयकी क्षपणामें अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना भी ले लेनी चाहिए। १२. अब इन दोनों करणोंका आगमके अनुसार अनुगम करते हुए वहाँ सर्व प्रथम अधःप्रवृत्तकरणसे पूर्व ही अन्तर्मुहूर्त काल तक होनेवाली स्वस्थान विशुद्धिके द्वारा स्थिति और अनुभागका इस प्रकार अपवर्तन होता है इस बातका कथन करनेके लिये आगेका सूत्र आया है___* संयमासंयमको अन्तर्मुहूर्त कालद्वारा प्राप्त करेगा, इसलिये वहाँसे लेकर सब जीव आयुकर्मको छोड़कर शेष कर्मोंके स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्मको अन्तःकोड़ाकोड़ीके भीतर करते हैं, शुभ कर्मोंके अनुभागबन्ध और अनुभागसत्कर्मको चतु:स्थानीय करते हैं तथा अशुभ कर्मों के अनुभागबन्ध और अनुभागसत्कर्मको द्विस्थानीय करते हैं।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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