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________________ गाथा ११५ ] एत्थतणगाहावयवत्थपरूवणा १०९ तत्थ माणस्स वत्तव्वो, तेसिमुदयाभावलक्खणोवसमे संते पयदलद्वीप समुत्पत्तिदंसणादो | पच्चक्खाण-चदुसंजलण-णवणोकसायाणमुदए दिजमाणे संते कधमुवसमो वोत्तुं सकिज त्तिणासंकणिज्जं, तेसिमुदयस्स सव्वघादित्ताभावेण देसोवसमस्स तत्थ वि संभवे विरोहाभावादो । पच्चक्खाणावरणीयोदयो सव्वघादी चेवेत्ति चे ? ण, देससंजमविसये तस्स वावाराभावादो । संजमलद्वी पुण बारसकसायाणमणुदयोवसमेण चदुसंजल-णवणोकसायाणं देसोवसमेण च समुप्पज्जदि त्ति वत्तव्वं । ६. तेसिं चैव पुव्वृत्ताणं पयडीणमणुदयिन्लाणं ट्ठिदिउदयाभावो हिदिउवसामणा णाम । अधवा सव्वासि कम्माणमंतोकोडाकोडीदो उवरिमट्ठिदीणमुदयाभावो हिदिउवसामणा त्ति वेत्तव्वा । अणुभागुवसामणा णाम पुव्वुत्ताणं कसायपयडीणं विट्ठाण-तिट्ठाण चउट्ठाणाणुभागस्स उदयाभावो, उदयिल्लाणं पि कसायाणं सव्वघादिफद्दयाणमुदयाभावो अणुभागोवसामणा त्ति घेत्तव्वं, तेसिं देसघादिविट्ठाणाणुभागोदयमिदंसणादो । णाणावरणादिकम्माणं पि तिट्ठाण - चउट्ठाण परिञ्चागेण विट्ठाणियाणुभागपडिलंभो अणुभागोवसामणा ति एत्थ वत्तव्वं, विरोहाभावादो । उपशामना कहनी चाहिए, क्योंकि उनके उदद्याभावलक्षण उपशमके होने पर प्रकृत लब्धि की उत्पत्ति देखी जाती है । शंका- वहाँ प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, चार संज्वलन और नौ नोकषायोंको उदयमें देनेपर उपशम कहना कैसे शक्य है ? समाधान - ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उनके उदयमें सर्वघातिपनेका अभाव होनेसे देशोपशमके वहाँ भी सम्भव होनेमें विरोधका अभाव है । शंका— प्रत्याख्यानावरणीयका उदय सर्वघाति ही है ? समाधान — नहीं, क्योंकि देशसंयमके विषय में उसका व्यापार नहीं होता । परन्तु संयमलब्धि बारह कषायोंके अनुदयरूप उपशमसे तथा चार संज्वलन और नौ नोकषायके देशोपशमसे उत्पन्न होती है ऐसा कहना चाहिए । $ ६. अनुदयवाली उन्हीं पूर्वोक्त प्रकृतियोंके स्थिति - उदयका अभाव स्थिति - उपशामना है । अथवा सभी कर्मों की अन्तःकोड़ाकोड़ीसे उपरिम स्थितियोंके उदयका अभाव स्थितिउपशामना है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । पूर्वोक्त कषायप्रकृतियोंके द्विस्थान, त्रिस्थान और चतुःस्थान अनुभागका उद्याभाव अनुभाग- उपशामना है तथा उदयवाले कषायों के भी सर्वघाति स्पर्धकोंका उदयाभाव अनुभाग उपशामना है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उनके देशघाति द्विस्थानीय अनुभागके उदयका नियम देखा जाता है । ज्ञानावरणादि कर्मोंके भी त्रिस्थान और चतुःस्थान अनुभाग के परित्यागसे द्विस्थानीय अनुभागकी प्राप्ति अनुभाग-उपशामना है ऐसा यहाँ कहना चाहिए, क्योंकि इसमें विरोधका अभाव है । अनुदय
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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