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________________ १०८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [संजमासंजमलद्धी खओवसमियसंजमलद्धी एदम्मि बीजपदे णिबद्धा त्ति सुसंबद्धं । 'वड्डावड्डी' एवं भणिदे तासु चेव संजमासंजम-संजमलद्वीसु अलद्धपुव्वासु पडिलद्धासु तल्लाभपढमसमयप्पहुडि अंतोमुहुत्तकालभंतरे पडिसमयमणंतगुणाए सेढीए परिणामवड्डी गहेयत्वा' उवरुवरि परिणामवड्डीए वड्डावड्डीववएसावलंबणादो । ५. 'उवसामणा य तह पुन्वबद्धाणं' एवं भणिदे ताओ चेव संजमासंजमसंजमलद्धीओ पडिवजमाणस्स पुव्वबद्धाणं कम्माणं चारित्तपडिबंधीणमणुदयलक्खणा उवसामणा घेत्तव्वा । तदो केसि कम्माणं पयडि-द्विदि-अणुभाग-पदेसभेयभिण्णाणमणुदयोवसामणाए देससंजमं सयलसंजमं वा एसो पडिवजइ त्ति एवंविहा परूवणा एदम्मि बीजपदे णिलीणा त्ति दट्ठव्वा । सा च पुव्वबद्धाणमुवसामणा चउन्विहा, पयडि-द्विदि-अणुभाग-पदेसविसयत्तेण भिण्णत्तादो। तत्थ पयडिउवसामणा णाम अणंताणुबंधिचउक्क-अपचक्खाणावरणीयकसायाणं उदयाभावो संजमासंजमं पडिवजप्रबन्धोंद्वारा उपलब्धि होती है, इसलिये क्षायोपशमिक संयमलब्धि इस बीजपदमें निबद्ध है यह कथन सुसम्बद्ध है। _ 'वड्ढावड्डी' ऐसा कहने पर अलब्धपूर्व उन्हीं संयमासंयम और संयमलब्धियोंके प्राप्त होने पर उनके लाभके प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण कालके भीतर प्रत्येक समयमें होनेवाली अनन्तगुणी श्रेणिरूपसे परिणामवृद्धिको ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उत्तरोत्तर ऊपर-ऊपर होनेवाली परिणामवृद्धिकी 'वडावड्डी' संज्ञाका अवलम्बन लिया गया है। विशेषार्थ-जिस प्रकार गृहीत मिथ्यात्वके त्याग करनेके बाद जिनोपदिष्ट जीवादि नौ पदार्थोंको हृदयंगम कर आत्मसन्मुख परिणामोंके होने पर परमार्थभूत सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होती है उसी प्रकार वेदककालके भीतर मिथ्यादृष्टि जीवके या सम्यग्दृष्टि जीवके हिंसादि पाँच पापोंका एकदेश और सर्वदेश त्यागपूर्वक तदनुरूप अन्य प्रवृत्तिके साथ प्रगाढ़रूपसे स्वरूपरमणताके होने पर क्रमसे भावरूपसे देशसंयम और सकलसंयमकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार जब यह जीव देशसंयम और सकलसंयमको प्राप्त करता है तक उसके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त काल तक प्रति समय विशुद्धिमें उत्तरोत्तर अनन्तगुणी वृद्धि होती रहती है। इसी तथ्यको पूर्वोक्त सूत्रगाथामें 'बड्डावड्डी' पदद्वारा स्पष्ट किया गया है। ६५. 'उवसामणा य तह पवबद्धाणं' ऐसा कहने पर उन्हीं संयमासंयम और संयम लब्धियोंको प्राप्त होनेवाले जीवके चारित्रका प्रतिबन्ध करनेवाले पूर्वबद्ध कर्मोंकी अनुदय लक्षणस्वरूप उपशामना लेनी चाहिए। इसलिए प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशभेदसे भेदको प्राप्त हुए किन कर्मोके अनुदयरूप उपशामना होनेसे यह जीव देशसंयम अथवा सकलसंयमको प्राप्त होता है इस प्रकारकी प्ररूपणा इस बीजपदमें लीन है यह जानना चाहिए। पूर्वबद्ध कर्मोंकी वह उपशामना चार प्रकारकी है, क्योंकि प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश उसके विषय होनेसे वह चार प्रकारकी हो जाती है। उनमेंसे संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले जीवके अनन्तानुवन्धीचतुष्क और अप्रत्याख्यानाबरणीय कषायोंके उदयाभावरूप प्रकृति १. ता०प्रतो गहेयन्वो इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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