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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [दसणमोहक्खवणा ११७. एवमेदमुवसंहरिय संपहि एत्थतणाणं पदविसेसाणं पदपडिवूरणं बीजपदावलंबणेणप्पाबहुअं परूवेमाणो तव्विसयमेव ताव पइण्णावकमाह___* दंसणमोहणीयक्खवगस्स पढमसमए अपुव्वकरणमादि कादूण जाव पढमसमयकदकरणिज्जो त्ति एदम्हि अंतरे अणुभागखंडय-ट्ठिदिखंडयउकीरणद्धाणं जहण्णकस्सियाणं हिदिखंडय-हिदिबंध-हिदिसंतकम्माणं जहण्णुकस्सयाणं आवाहाणं च जहण्णुक्कस्सियाणमण्णेसिं च पदाणमप्पाबहुअं वत्तइस्सामो। $ ११८. सुगममेदं, दसणमोहक्खवयसंबंधियाणमेदेसिं जहाणिद्दिवाणं पदाणं जहण्णुकस्सपदविसेसिदाणमप्पाबहुअं कस्सामो त्ति पइण्णामेत्तवाबदत्तादो । * तं जहा। 5 ११९. सुगममेदं । प्रकरणसंगत होने पर भी जो अर्थ सूत्रद्वारा नहीं भी गहा गया हो और जो अर्थ देशामर्षकरूपसे सूचित किया गया हो उस सबके व्याख्यान करनेको परिभाषा कहते हैं। इस प्रकार परिभाषाके इस लक्षणके अनुसार यहाँ पूर्वोक्त चूंर्णिसूत्रद्वारा यह सूचित किया गया है कि दर्शनमोहकी क्षपणासम्बन्धी जो पाँच सूत्रगाथाएं पूर्व में निर्दिष्ट की गई हैं उनके उक्तअनुक्त सभी प्रकारके विषयका यहाँ तक चूर्णिसूत्रों द्वारा विवेचन किया गया है। इतना अवश्य है कि इस अनुयोगद्वारसम्बन्धी पाँचवीं सूत्रगाथाकी परिभाषा स्वयं चूर्णिसूत्रकारने आगे की है। $११७. इस प्रकार इसका उपसंहार करके अब बीजपदोंका अवलम्बन लेकर इस अनुयोगद्वारके पदबिशेषसम्बन्धी पदोंकी पूर्ति करनेवाले अल्पबहुत्वका कथन करते हुए सर्वप्रथम तद्विषयक प्रतिज्ञावाक्यको कहते हैं * दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवाले जीवके प्रथम समयमें अपूर्वकरणसे लेकर कृतकृत्य होनेके प्रथम समय तक इस अन्तरालमें जघन्य और उत्कृष्ट अनुभागकाण्डकउत्कीरणकाल तथा स्थितिकाण्डक उत्कीरणकालोंके; जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिकाण्डक, स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्मोंके जघन्य और उत्कृष्ट आवाधाओंके तथा अन्य पदोंके अल्पबहुत्वको बतलावेंगे । $ ११८. यह सूत्र सुगम है, क्योंकि दर्शनमोहकी क्षपणासे सम्बन्ध रखनेवाले जघन्य और उत्कृष्ट पदविशिष्ट यथानिर्दिष्ट इन पदोंके अल्पबहुत्वको करेंगे इस प्रकारकी प्रतिज्ञामात्रमें इस सूत्रका व्यापार है। * वह जैसे । ६ ११९. यह सूत्र सुगम है।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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