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________________ गाथा ११४] कदकरणिज्जस्स कज्जविसेसपरूवणा $ ११४. अहवा 'तेउ-पम्म-सुक्के वि अंतोमुहुत्तकदकरणिज्जो' एदस्स सुत्तस्सत्थमेवं भणंता वि अत्थि-जहा अधापवत्तकरणपारंमे पुव्यत्तविहाणेण तेउ-पम्मसुकाणमण्णदराए लेस्साए पारद्धकिरियस्स पुणो दंसणमोहक्खवणकिरियापरिसमत्तीए कदकरणिज्जभावेण परिणममाणस्स णिच्छएण सुक्कलेस्सा चेव भवदि, विसोहीए परमकोडिमारूढस्स तदविरोहादो । पुणो तिस्से विणासेण जइ तेउपम्मलेस्साओ समयाविरोहेण परावत्तेदि तो जाव अंतोमुहुत्तकदकरणिज्जो ण जादो ताव ण परावत्तेदि ति । $ ११५. एवमेदेण सुत्तेण कदकरणिज्जस्स लेस्सापरावत्तिकमं परूविय संपहि पयदमत्थमुवसंहरेमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ * एवं परिभासा समत्ता। ६११६. एवमेसा सुत्तपरिभासा समत्ता त्ति पयदत्थोवसंहारवक्कमेदं सुगमं । $ ११४. अथवा 'तेउ-पम्म-सुक्के वि अंतोमुहुत्तकदकरणिज्जो' इस सूत्रका कुछ आचार्य इसप्रकार भी अर्थ करते हैं कि जिस प्रकार अधःप्रवृत्तकरणके प्रारम्भमें पूर्वोक्त विधिसे तेज, पद्म और शुक्ललेश्यामेंसे अन्यतर लेश्याके साथ क्षपणक्रियाका प्रारम्भ करनेवाला जो जीव पुनः दर्शनमोहकी क्षपणारूप क्रियाकी समाप्ति होनेपर कृतकृत्यरूपसे परिणमन करता है उसके नियमसे शुक्ललेश्या ही होती है, क्योंकि विशुद्धिके द्वारा उत्कृष्ट कोटिको प्राप्त हुए उक्त जीवके शुक्ललेश्याके होनेमें विरोध नहीं है । पुनः उसका विनाश होनेसे आगममें बतलाई गई विधिके अनुसार यदि तेज और पद्मलेश्यारूपसे परिणत होता है तो कृतकृत्य होनेके बाद जब तक अन्तर्मुहूर्तकाल नहीं जाता तब तक वह उक्त लेश्यारूपसे परिवर्तन नहीं करता। विशेषार्थ-क्षायिक सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके समय शुभ तीन लेश्याओंमेंसे कोई एक लेश्या होती है। प्रश्न यह है कि कृतकृत्य सम्यग्दृष्टि होनेके पूरे काल तक वही एक लेश्या बनी रहती है या वह बदल जाती है ? साथ ही दूसरा प्रश्न यह भी है कि कृतकृत्य होनेके बाद लेश्याकी क्या स्थिति बनती है ? इन दोनों प्रश्नोंका समाधान उक्त सूत्र द्वारा करते हुए कतिपय आचार्य उक्त सूत्रकी क्या व्याख्या करते हैं यह उसको टीकामें बतलाया गया है। टीकाका आशय स्पष्ट होनेसे यहाँ हम उस पर विशेष प्रकाश डालनेकी आवश्यकता नहीं समझते। ६ ११५. इस प्रकार इस सूत्रद्वारा कृतकृत्य सम्यग्दृष्टिके लेश्याके परावर्तनके क्रमका कथन कर अब प्रकृत अथेका उपसंहार करते हुए आगेका सूत्र कहते हैं * इस प्रकार परिभाषा समाप्त हुई । ६ ११६. इस प्रकार यह सूत्र परिभाषा समाप्त हुई इस प्रकार प्रकृत अर्थका उपसंहार. करनेवाला यह सूत्रवाक्य सुगम है। विशेषार्थ--सूत्रमें जो अर्थ कहा गया हो या उसके द्वारा जो अर्थ सूचित होता हो उसके व्याख्यान करनेको विभाषा कहते हैं। तथा जो अर्थ सूत्रद्वारा कहा गया हो,
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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