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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ दसणमोहक्खवणा * जइ तेउ-पम्म-सुक्के वि, अंतोमुहुत्तकदकरणिज्जो । $ ११३. एवं भणंतस्साभिप्पाओ अधापवत्त करणम्मि विसोहिमावूरिय तेउपम्म-सुकाणमण्णदराए वट्टमाणसुहलेस्साए दंसणमोहक्खवणं पट्टविय पुणो जाव कदकरणिजो होइ ताव सा चेव पुव्वपारद्धलेस्सा वट्टमाणा होदूण पुणो वि जाव अंतोमुहुत्तं ण गदं ताव पारद्धलेस्सं मोत्तूणण्णलेस्सं ण परावत्तेदि त्ति । किं कारणं ? कदकरणिज्जभावं पडिवज्जमाणस्स पुव्वपारद्धलेस्साए उकस्संसो भवदि । पुणो तिस्से मज्झिमंसयं गंतूणंतोमुहुत्तमच्छिय जहण्णंसये वि जाव अंतोमुहुत्तकालं ण अच्छिदो ताव अण्णलेस्सापरावत्तीए संभवाणुववत्तीदो। होता ऐसा नहीं है। जिसका कृतकृत्य होनेके प्रथम समयमें मरण होता है उसके बध्यमान एकमात्र देवायु ही सत्स्वरूप होती है और उस समय उसका नियमसे उदय हो जाता है। परन्तु इस जीवने उस समय जो मनुष्य पर्याय छोड़कर देवपर्याय ग्रहण की है मुख्यरूपसे वह अपनी अन्तरंग योग्यताके कारण ही। देवायुके उदयके कारण उस समय वह देव हुआ इस कथनको मात्र इसीलिए उपचरित स्वीकार किया गया है। इसी प्रकारका उपादानउपादेयसम्बन्ध और निमित्त-नैमित्तिकसम्बन्ध सर्वत्र आगममें स्वीकार किया गया है। यहाँ एक प्रश्न यह भी उठता है कि इस जीवके कृतकृत्य होनेके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तकालतक देवगतिको छोड़कर अन्य गतियों में उत्पन्न होने योग्य संक्लेश परिणाम और लेश्यापरिवर्तन क्यों नहीं होता ? समाधान यह है कि अन्तर्मुहूर्त कालतक उक्त जीवमें स्वयं ही ऐसी पात्रता नहीं होती कि वह कृतकृत्य होनेके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तकालतक देवगतिको छोड़कर मरकर अन्य गतियोंमें जाने योग्य संक्लेश परिणामको उत्पन्न कर सके, और जब वह इस जातिका परिणाम ही उक्त कालके भीतर पैदा नहीं कर सकता तो बदलकर तदनुरूप लेश्याका होना तो और भी असम्भव है। इतने विवेचनसे दो बातोंका पता लगता है कि एक कालमें अन्तरंग और बहिरंग साधनोंका योग स्वयं होता है और जिस कार्यके वे सूचक होते हैं, उस कालमें वह कार्य भी द्रव्यके परिणमनस्वभावके कारण स्वयं होता है। अविनाभावसम्बन्ध वश ही उनमें परस्पर कार्यकारण व्यवहार होनेका नियम है। यदि वह तेज, पद्म और शुक्ललेश्यामेंसे किसी भी लेश्यामें अवस्थित है तो कृतकृत्य होनेके बाद भी अन्तर्मुहूर्त कालतक उक्त लेश्यामें ही अवस्थित रहता है। ११३. इसप्रकार कहनेवाले आचार्यका यह अभिप्राय है कि अधःप्रवृत्तकरणमें विशुद्धिको पूर कर तेज, पद्म और शुक्ल इनमेंसे किसी एक शुभ लेश्यामें दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ कर पुनः जब जाकर यह जीव कृतकृत्य होता है तब तक उसके पूर्व में प्रारम्भ की गई वही लेश्या पाई जाती है तथा पुनः उसके आगे भी जब तक अन्तमुहूर्तकाल नहीं गया तब तक प्रारब्ध उक्त लेश्याको छोड़कर अन्य लेश्यारूप परिवर्तन नहीं करता है, क्योंकि कृत्यकृत्यभावको प्राप्त होनेवाले जीवके पूर्व में प्रारब्ध हुई लेश्याका उत्कृष्ट अंश होता है। पुनः उसके मध्यम अंशको प्राप्त कर और अन्तर्मुहूते कालतक उस रूप रहकर जघन्य अंशगें भी जब अन्तर्मुहूर्त कालतक नहीं रह लेता तबतक अन्य लेश्यारूप परिवर्तनका होना सम्भव नहीं है।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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