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________________ गाथा ११४ ] एत्थतणपदविसेसप्पाबहुअपरूवणा * सव्वत्थोवा जहणिया अणुभागखंडयउक्कीरणद्धा । $ १२०. सव्वेहितो थोवा सव्वत्थोवा, उवरि भणिस्समाणासेसपदेहितो थोवयरा त्ति वुत्तं होइ । का सा जहणिया अणुभागखंडयउक्कीरणद्धा, कम्हि उद्देसे एसा गहेयव्वा ? दंसणमोहणीयस्स ताव अदुवस्समेतद्विदिसंतकम्मे चिट्ठमाणे जं पुव्वमणुभागखंडयं तस्स उक्कीरणद्धा सव्वजहण्णा गहेयव्वा णाणावरणादिसेसकम्माणं पुण पढमसमयकदकरणिज्जे जायमाणे जं पुन्विल्लमणुभागखडयं अणियट्टिचरिमावत्थाए तदुक्कीरणद्धा सव्वजहण्णगा ति गहेयव्वा । तत्तो परं कदकरणिज्जकालब्भंतरे द्विदि• अणुभागखंडयघादादिकिरियाणमप्पवुत्तिदंसणादो। तदो सव्वुकस्सविसोहिणिबंधणा एसा सव्वत्थोवा त्ति सिद्धं १ । * उक्कस्सिया अणुभागखंडयउक्कीरणद्धा विसेसाहिया। ६१२१. किं कारणं? सव्वकम्माणं पि अपुव्वकरणपढमसमयाढत्ताणुभागखंडयुकीरणद्धाए गहणादो। संखेजगुणा एसा किण्ण जादा त्ति णासंकणिजं, तहाभावसंभवासंकाए एदेणेव सत्तेण णिसिद्धत्तादो २। * अनुभागकाण्डकका जघन्य उत्कीरणकाल सबसे थोड़ा है ।। $ १२०. सबके स्तोकको सर्वस्तोक कहते हैं। ऊपर कहे जानेवाले समस्त पदोंसे स्तोकतर है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शंका--अनुभागकाण्डकका वह जघन्य उत्कीरणकाल कौनसा है, यह किस स्थानका लेना चाहिए ? समाधान--सर्वप्रथम दर्शनमोहनीयके आठ वर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्मके रहनेपर जो पहलेका अनुभागकाण्डक है उसका उत्कीरण काल सबसे जघन्य है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। परन्तु कृतकृत्य होनेके प्रथम समयमें ज्ञानावरणादि शेष कर्मोंका जो पहलेका अनुभागकाण्डक है, अनिवृत्तिकरणकी अन्तिम अवस्थामें उसका उत्कीरणकाल सबसे जघन्य है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उससे आगे कृतकृत्यकालके भीतर स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात आदि क्रियाओंकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती। अतः सबसे उत्कृष्ट विशुद्धिनिमित्तक यह सबसे जघन्य है यह सिद्ध हुआ १। * उससे उत्कृष्ट अनुभागकाण्डकका उत्कीरणकाल विशेष अधिक है । $ १२१. क्योंकि सभी कर्मोके अपूर्वकरणके प्रथम समयमें प्राप्त अनुभागकाण्डकसम्बन्धी उत्कीरणकालका यहाँ ग्रहण किया गया है। शंका-यह संख्यातगुणा क्यों नहीं है ? समाधान-ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उस प्रकारकी होनेवाली आशंकाका इसी सूत्रद्वारा निषेध कर दिया गया है २ ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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