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________________ ३ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ * माणस्स संखेज्जेसु आगरिसेसु गदेसु तदो सइं कोधो परिवत्तदि । ६८. माणागरिसेसु पादेक्कं लोभ-मायाणमागरिससहस्साविणाभावीसु गदेसु सई कोहेण परिवत्तदि, देवगदीए अप्पसत्थयरकोहपरिणामस्स पाएण संभवाणुवलंभादो । एवमेसो परिवत्तणकमो ताव जाव णिरुद्धाउट्ठिदिचरिमसमयो त्ति । एत्थ संदिद्विमुहेण समुदायत्थपरूवणाए णिरयगइभंगो। णवरि विवज्जासेण कायव्वमिदि । लोभसव्वसमासो एसो २७ । मायासव्वसमासो १८ । माणसव्वसमामो ६ । कोहसव्वसमासो ३ । ६९. एवमेत्तिएण पबंधेण 'को वा कम्हि कसाए अभिक्खमुवजोगमुवजुत्तो' त्ति एदम्मि गाहापच्छिमद्धे पडिबद्धमभिक्खमुवजोगपरूवणं कादूण संपहि तव्विसयमेवमप्पाबहुअं परूवेमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * एदीए परूवणाए एक्कम्हि भवग्गहणे णिरयगदीए संखेजवासिगे वा असंखेजवासिगे वा भवे लोभागरिसा थोवा । ७०. एदीए अणंतरपरूविदाए अभिक्खमवजोगपरूवणाए अप्पाबहुअं वत्तइस्सामो त्ति भणिदं होदि । एक्कम्हि भवग्गहणे एगभवग्गहणमहिरणं कादूणे त्ति वुत्तं ___* मानके संख्यात हजार परिवर्तनवारोंके होने पर एक वार क्रोधरूप परिवर्तन होता है। ६८. प्रत्येक मानकषायका परिवर्तनवार लोभ और मायाके संख्यात हजार परिवर्तन वारोंका अविनाभावी है, इस क्रमसे मानकषायके संख्यात हजार परिवर्तनवारोंके हो जानेपर एकवार क्रोधरूपसे परिवर्तित होता है, क्योंकि देवगतिमें अप्रशस्ततर क्रोधपरिणामकी प्रायः उत्पत्ति नहीं है । इस प्रकार प्राप्त हुई आयुके अन्तिम समय तक यह परिवर्तनक्रम होता रहता है। यहाँ पर संदृष्टि द्वारा प्ररूपणा नरकगतिके समान है। इतनी विशेषता है कि विपर्यासरूपसे प्ररूपणा करनी चाहिए। संदृष्टिमें लोभ कषायका कुल योग २७ अंकप्रमाण है, मायाकषायका कुल योग १८ अंकप्रमाण है, मानकषायका कुल योग ६ अंकप्रमाण है और क्रोधकषायका कुल योग ३ अंकप्रमाण है। विशेषार्थ-जिस प्रकार पहले नरकगतिमें क्रोधादि कषायोंके परिवर्तनवारोंका स्पष्टीकरण कर आये हैं, यहाँ देवगतिमें भी उसी प्रकार जान लेना चाहिए। इतनी विशेषता है कि वहाँ क्रोध, मान, माया और लोभ इस क्रमको स्वीकार कर स्पष्टीकरण किया है। किन्तु यहाँ लोभ, माया, मान और क्रोध इस क्रमको स्वीकार कर विवेचन करना चाहिए। ६९. इस प्रकार इस प्रबन्ध द्वारा गाथाके 'को वा कम्हि कसाए अभिक्खमुवजोगमुवजुत्तो' इस उत्तरार्धसे सम्बन्ध रखनेवाले पुनः पुनः उपयोगका कथन कर अब उसीके विषयभूत अल्पबहुत्वका कथन करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * इस प्ररूपणाके अनुसार एक भवग्रहणमें नरकगतिमें संख्यात वर्षवाले भवमें या असंख्यात वर्षवाले भवमें लोभके परिवर्तनवार सबसे स्तोक हैं । ७०. अनन्तर पूर्व कही गई इस पुनः-पुनः होनेवाली उपयोगप्ररूपणाके अनुसार अल्पबहुत्वको बतलावेंगे यह उक्त कथनका तात्पर्य है। एक्कम्हि भवग्गहणे' अर्थात् एक भवग्रहण
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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