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________________ ( ३५ ) ये चार स्थल हैं, जिनमें कौन निक्षेप किस नयका विषय है यह स्पष्ट किया गया है । स्थापना निक्षेप ऋजुसूत्रनयका विषय नहीं है इसे इन सब स्थलोंमें स्वीकार किया गया है । इसीसे यह स्पष्ट हो जाता है कि कषायप्राभृत चूर्णिकारने द्रव्यार्थिकनयरूपसे ऋजुसूत्रनयको नहीं स्वीकार किया है, क्योंकि सादृश्य सामान्यकी विवक्षामें हो किसी अन्य वस्तुमें अन्य वस्तुकी स्थापना की जा सकती है और सादृश्य- सामान्य द्रव्यार्थिकनयका विषय है, जिसे पर्यायार्थिकनयका भेद ऋजुसूत्रनय नहीं स्वीकार करता । अतः यह स्पष्ट है कि कषायप्राभृतचूर्णिकारने ऋजुसूत्रनयको पर्यायार्थिकनयरूपसे ही स्वीकार किया है, द्रव्यार्थिकनयरूपसे नहीं । फिर नहीं मालूम उक्त प्रस्तावनामें किस आधारसे यह विधान करनेका साहस किया है कि 'कषायप्राभृतचूर्णिकार ऋजुसूत्रनयको द्रव्यार्थिकनय में समावेश करनेके लिए श्वेताम्बर आचार्योंकी परम्पराका अनुसरण करते है ।' शायद उन्होंने अर्थनयको द्रव्यार्थिकनय समझकर यह विधान किया है । किन्तु यदि यही बात है तो हमें लिखना पड़ता है कि या तो यह उनकी नयविषयक अनभिज्ञताका परिणाम है या फिर इसे सम्प्रदायका व्यामोह कहना होगा । कारण कि जब कि आगम में द्रव्यार्थिकनयके नैगम, संग्रह और व्यवहार ये तीनों भेद अर्थनयस्वरूप ही स्वीकार किये गये हैं और पर्यायार्थिकनयके दो भेद करके उनमें से ऋजुसूत्रनयको अर्थनयस्वरूप स्वीकार किया गया है ऐसी अवस्थामें बिना आधारके उसे द्रव्यार्थिकनय स्वरूप बतलाना और अपने इस अभिप्रायसे कषायप्राभृतचूर्णिकारको जोड़ना इसे सम्प्रदायका व्यामोह नहीं कहा जायगा तो और क्या कहा जायगा । यों तो सातों ही नयों का विषय अर्थ वस्तु है । फिर भी उनमेंसे नैगमादि तीन नय पर्यायको गौण कर सामान्यकी मुख्यतासे वस्तुका बोध कराते हैं, इसलिए वे द्रव्यार्थिकरूपसे अर्थनय कहे गये हैं । ऋजुसूत्रनय सामान्यको गौणकर वर्तमान पर्यायकी मुख्यतासे वस्तुका बोध कराता है इसलिए वह पर्यायार्थिकरूपसे अर्थनय कहा गया है । और शब्दादि तीन नय यद्यपि सामान्यको गौणकर वर्तमान पर्यायकी मुख्यतासे ही वस्तुका बोध कराते हैं। फिर भी ऋजुसूत्रसे इन शब्दादि तीन नयोंमें इतना अन्तर है कि ऋजुसूत्रनय अर्थप्रधाननय है और शब्दादि तीन नय शब्दप्रधान नय हैं । इसलिए नैगमादि सातों नय अर्थनय और शब्दनय इन दो भेदोंमें विभक्त होकर अर्थनयके चार और शब्दनयके तीन भेद हो जाते हैं । यहाँ अर्थनयके चार भेदोंमें ऋजुसूत्रनय सम्मिलित है, मात्र इसीलिए वह द्रव्यार्थिकनय नहीं हो जायगा । रहेगा वह पर्यायार्थिक ही । षट्खण्डागम और कषायप्राभृतचूर्णि प्रभृति जितना भी दिगम्बर आचार्यों द्वारा लिखा गया साहित्य है वह सब एक स्वर से एकमात्र इसी अभिप्रायकी पुष्टि करता है। मालूम पड़ता है कि उक्त प्रस्तावना लेखकने दिगम्बर साहित्यका और स्वयं कषायप्राभृतचूर्णिका सम्यक् प्रकारसे परिशीलन किये बिना ही यह अनर्गल विधान किया है । यहाँ प्रसंग हम यह सूचित कर देना चाहते हैं कि श्रुतकेवली भद्रबाहुके कालमें ही वस्त्र पात्रधारी श्वेताम्बर मतकी स्थापनाकी नीव पड़ गई थी। यह इसीसे स्पष्ट है कि श्वेताम्बर परम्परा जिनलिंगधारी भद्रबाहुको श्रुतकेवली स्वीकार करके भी उनके प्रति अनास्था दिखलाती है और इन्हें गौण कर अपनी परम्पराको स्थूलभद्र आदिसे स्वीकार करती है। ( २ ) प्रस्तावना लेखकने 'श्वेताम्बराचार्यांना ग्रन्थोंमां कषायप्राभृतना आधार साक्षी तथा अतिदेशो' इस दूसरे उपशीर्षकके अन्तर्गत श्वेताम्बर कार्मिक साहित्यमें जहाँ-जहाँ कषायप्राभृतके उल्लेखपूर्वक कषायप्राभृत और उसकी चूणिको विषयकी पुष्टिके रूपसे निर्दिष्ट किया गया है या विषयके स्पष्टीकरणके लिए उनको साधार उपस्थित किया गया है उनका संकलन किया है । ( १ ) उनमें से प्रथम उल्लेख पंचसंग्रह ( श्वे. ) का है । इसकी दूसरी गाथामें 'शतक' आदि पाँच ग्रन्थोंको संक्षिप्त कर इस पंचसंग्रह ग्रन्थकी रचना की गई है, अथवा पाँच द्वारोंके आश्रयसे इस पंचसंग्रह ग्रन्थकी रचना की गई है यह बतलाया गया है । किन्तु स्वयं चन्द्रर्षि महत्तरने उक्त ग्रन्थकी तीसरी गाथामें वे पाँच द्वार कौनसे, इनका जिस प्रकार नामोल्लेख कर दिया है उस प्रकार गाथारूप या वृत्तिरूप अपनी किसी भी रचनामें एक 'शतक' ग्रन्थके नामोल्लेखको छोड़कर अन्य जिन चार ग्रंथोंके आघारसे इस पंचसंग्रह ग्रंथकी रचना की गई है उनका नामोल्लेख नहीं किया है । अतएव
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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