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________________ ( ३६ ) एक शतक के सिवाय अन्य जिन चार ग्रन्थोंका अपने पंचसंग्रह ग्रंथ में उन्होंने संक्षेपीकरण किया है वे चार ग्रंथ कौनसे इसका तो उनकी उक्त दोनों रचनाओंसे पता चलता नहीं । हाँ उक्त ग्रंथकी 'नमिठण जिणं वीरं' इस मंगल गाथाको टीकामें मलयगिरिने अवश्य ही उन पाँच ग्रंथोंका नामोल्लेख किया है । स्वयं चन्द्रषि महत्तर अपनी रचना में पाँच द्वारोंका नामोल्लेख तो करते हैं, परन्तु उन ग्रंथोंका नामोल्लेख नहीं करते इसमें क्या रहस्य है यह अवश्य ही विचारणीय है । बहुत सम्भव तो यही दिखलाई देता है कि श्वेताम्बर परम्परामें क्षपणा आदि विधिका आनुपूर्वीसे सविस्तर कथन उपलब्ध न होनेके कारण उन्होंने कषायप्राभृत ( कषायप्राभृत में उसकी चूर्णि भी परिगणित है ) का सहारा तो अवश्य लिया होगा, परन्तु यतः कषायप्राभृत श्वेताम्बर परम्पराका ग्रंथ नहीं है, अतः पञ्चसंग्रहमें किन पाँच ग्रंथोंका संग्रह है इसका पूरा स्पष्टी - कारण करना उन्होंने उचित नहीं समझा होगा । ( २ ) दूसरा उल्लेख शतकचूर्णिके टिप्पणका है । यह टिप्पण अभी तक मुद्रित नहीं हुए हैं। प्रस्तावना लेखकने अवश्य ही यह संकेत किया हैं कि उक्त टिप्पणमें किस कषायमें कितनी कृष्टियाँ होती हैं इस विषयकी प्ररूपणा करनेवाली कषायप्राभृतकी १६३ क्रमांक गाथा उद्धृत पाई जाती है । सो इससे यही तो समझा जा सकता है कि श्वेताम्बर परम्परामें क्षपणाविधिकी सांगोपांग प्ररूपणा न होनेसे शतकचूर्णिके कर्त्ताने किस कषायकी कितनी कृष्टियाँ होती हैं इस विषयका विशेष विवेचन प्रायः कषायप्राभृतके आधार से किया है यह समझकर ही उक्त टिप्पणकारने प्रमाणस्वरूप उक्त गाथा उद्धृत की होगी । ( ३ ) तीसरा उल्लेख सप्ततिका चूर्णिका है । इसमें सूक्ष्मसाम्परायसम्बन्धी कृष्टियोंकी रचनाका निर्देशकर उनके लक्षणको कपायप्राभृतके अनुसार जाननेकी सूचना सप्ततिका चूर्णिकारने इसीलिए की जान पड़ती है कि श्वेताम्बर परम्परामें इसप्रकारका सांगोपांग विवेचन नहीं पाया जाता । सप्ततिका चूर्णिका उक्त उल्लेख इस प्रकार है—'तं वेयंतो बितिय किट्टीओ तइयकिट्टीओ य दलियं घेतूणं सुहुमसांपराइय किट्टीओ करेइ । तेसि लक्खणं जहा कसायपाहुडे ।' ( ४ ) चौथा उल्लेख भी सप्ततिका चूर्णिका है । इसमें अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण में जो अनेक वक्तव्य हैं उन्हें कषायप्राभृत और कर्मप्रकृतिसंग्रहणीके अनुसार जाननेकी सूचना की गई है । सप्ततिका चूर्णिका वह उल्लेख इस प्रकार है— 'एत्थ अपुव्वकरण - अणियट्टिअद्धासु अणेगाइ वत्तव्त्रगाई जहा काय कम्पगडिसंगहणीए वा तह वत्तव्वं । सो इस विषय में इतना ही कहना है कि कर्मप्रकृतिसंग्रहणी स्वयं एक संग्रह रचना है । अतः उसमें अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणके कालों में होनेवाले कार्य-विशेषोंका जो भीं निर्देश उपलब्ध होता है वह सब अन्य ग्रन्थके आधारसे ही लिया गया होना चाहिए । इस विषयमें जहाँ तक हम समझ सके हैं, कषायप्राभृतचूर्णि और कर्मप्रकृति चूर्णिकी तुलना करने पर ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि कर्मप्रकृतिचूर्णिकारके समक्ष कषाप्रप्राभृत अवश्य रही है । यथा— १०२ चरियसमयमिच्छाइट्ठी से काले उवसंतदंसणमोहणीओ । १०३. ताघे चेव तिण्णि कम्मंसा उप्पादिदा । — कषायप्राभृतचूर्णि अब इसके प्रकाशमें कर्मप्रकृति उपशमनाकरण गाथा १९ की चूर्णिपर दृष्टिपात कीजिएचरिमसमयमिच्छाद्दिट्ठी से काले उवसमसम्मद्दिट्ठि होहित्ति ताहे बितीर्यातीते तिझ अणुभागं करेति । यहाँ कर्मप्रकृति चूर्णिकारने अपने सम्प्रदायके अनुसारं मिथ्यात्व गुणस्थानके अन्तिम समयमें मिथ्यात्वके द्रव्यके तीन भाग हो जाते हैं, इस मतकी पुष्टि करनेके लिए उक्त वाक्य रचनाके मध्य में 'होहित्ति' इतना पाठ अधिक जोड़ दिया । बाकीकी पूरी वाक्य रचना कषायप्राभृतिचूणिसे ली गई है यह कर्मप्रकृतिकी १८ और १९वीं गाथाओं तथा उनकी चूर्णियों पर दृष्टिपात करनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है । यह एक उदाहरण । पूरे प्रकरण पर दृष्टिपात करनेसे यह स्पष्ट विदित होता है कि कर्मप्रकृति और उसकी चूर्णिका उपशमना प्रकरण तथा क्षपणाविधि कषायप्राभृति चूर्णिके आधारसे लिपिबद्ध करते हुए
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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