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________________ ( ३४ ) श्रेणिपर आरोहण करनेवाला जीव अन्य लिंगवाला न होकर वर्तमानमें निर्ग्रन्थ ही होता है और इस अपेक्षासे उसके निर्ग्रन्थ अवस्था में बाँधे गये कर्म भजनीय न होकर नियमसे पाये जाते हैं यह दिखलानेके लिए ही किया है, क्योंकि जो जीव अन्तरंगमें निर्ग्रन्थ होता है वह बाह्य में नियमसे निग्रन्थ होता है। किन्तु इन दोनोंके परस्पर अविनाभावको न स्वीकार कर जो श्वेताम्बर सम्प्रदायवाले इच्छानुसार वस्त्र-पात्रादि सहित अन्य वेशमें रहते हुए भी वर्तमानमें क्षपकश्रेणि आदिपर आरोहण करना या रत्नत्रयस्वरूप मुनि लिंगकी प्राप्ति मानते हैं उनके उस मतका निषेध करनेके लिए जयधवला टीकाकारने 'णिग्गंथवदिरित्तसेसाणं' पदकी योजना की है। विचार कर देखा जाय तो उनके इस निर्देशमें किसी भी प्रकारकी साम्प्रदायिकताकी गन्ध न होकर वस्तुस्वरूपका उद्घाटनमात्र है, क्योंकि भीतरसे जीवनमें निर्ग्रन्थ वही हो सकता है जो वस्त्र-पात्रादिका बुद्धिपूर्वक त्यागकर बाह्यमें जिनमुद्राको पहले ही धारण कर लेता है। कोई बुद्धिपूर्वक वस्त्र-पात्र आदिको स्वीकार करे, उन्हें रखे, उनकी सम्हाल भी करे फिर भी स्वयंको वस्त्र-पात्र आदि सर्व परिग्रहका त्यागी बतलावे. इसे मात्र जीवनकी विडम्बना करनेवाला ही कहना चाहिए। अतः वर्तमानमें जिसने वस्त्र-पात्रादि सर्व परिग्रहका त्यागकर निर्ग्रन्थ लिंग स्वीकार किया है वही क्षपक हो सकता है और ऐसे क्षपकके निर्ग्रन्थ लिंग ग्रहण करनेके समयसे लेकर बाँधे गये कर्म सत्तामें अवश्य पाये जाते हैं यह दिखलानेके लिये ही श्री जयधवला टीकाकारने अपनी टीकामें 'सर्व लिंग' पदका अर्थ 'निर्ग्रन्थ लिंग व्यतिरिक्त अन्य सब लिंग' किया है जो 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिः।' इस नीतिवचनको अनुसरण करनेवाला होनेसे वर्तमानमें उपयुक्त ही है । दूसरा उल्लेख है-२४. 'णेगम-संगह-ववहारा सव्वे इच्छंति । २५. उजुसुदो ठवणवज्जे । (क. णि पृ. १७) इसका व्याख्यान करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि नैगम, संग्रह और व्यवहार ये तीन द्रव्यार्थिक नय हैं और ऋजुसूत्र आदि चार पर्यायार्थिक नय हैं। इस विषयमें दिगम्बर परम्परामें कहीं किसी प्रकारका मतभेद नहीं दिखलाई देता। कषायप्राभूतचूर्णिकार भी अपने चूर्णिसूत्रोंमें सर्वत्र ऋजुसूत्रनयका पर्यायार्थिकनयमें ही समावेश करते हैं। फिर भी उक्त ( श्वे. ) मुनिजीने अपनी प्रस्तावनामें यह उल्लेख किस आधारसे किया है कि 'कषायप्राभूतचूर्णिकार ऋजुसूत्रनयको द्रव्यार्थिकनय स्वीकार करते हैं।' यह समझके बाहर है। उक्त कथनकी पुष्टि करनेवाला उनका वह वचन इस प्रकार है-'अहीं कषायप्राभूत चूर्णिकार ऋजुसूत्रनयनो द्रव्याथिकनयमां समावेश करवा द्वारा श्वेताम्बराचार्योनी सैद्धान्तिक परंपराने अनुसरे छे कारणके श्वेताम्बरोंमें सैद्धान्तिक परम्परा ऋजसूत्रनयनो द्रव्यार्थिक नयमां समावेश करे छे.' __ कषायप्राभूत चूणिमें ऐसे चार स्थल हैं जहाँ निक्षेपोंमें नययोजना की गई है। प्रथम पेज्ज निक्षेपके भेदों की नययोजना करनेवाला स्थल । यथा २४. णेगम-संगह-ववहारा सव्वे इच्छंति । २५. उजुसुदो ठवणज्जे। २६. सद्दणयस्स णामं भावो च । पृ. १७ । दूसरा 'दोस' पदका निक्षेप कर उन सबमें नययोजना करनेवाला स्थल । यथा ३२. णेगम-संगह-व्यवहारा सव्वे णिक्खेवे इच्छंति । ३३, उजुसुदो ठवणवज्जे । ३४. सहणयस्स णामं भावो च । पृ. १७ । तीसरा 'संकम' पदका निक्षेप कर उन सबमें नययोजना करनेवाला स्थल । यथा ५. णेगमो सव्वे संकमे इच्छइ । ६. संगह-ववहारा कालसंकममवणेति। ७. उजुसुदो एवं च ठवणं च अवणेइ । ८. सद्दस्स णामं भावो य । पृ. २५१ । चौथा 'टाण' पदका निक्षेप कर उन सबमें नययोजना करनेवाला स्थल । यथा १०. णेगमो सव्वाणि ठाणाणि इच्छइ । ११. संगह-ववहारा पलिवीचिट्ठाणं उच्चट्ठाणं च अवर्णेति । १२. उजुसुदो एदाणि च ठवणं च अद्धठाणं च अवणेइ। १३. सद्दणयो णामट्ठाणं संजमट्ठाणं खेत्तट्ठाणं भावट्ठाणं च इच्छदि । पृ. ६०७-६०८
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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