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________________ गाथा ९४ ] दंसणमोहोवसामणा २६९ 5 १४२. संपहि अपुव्वकरणचरिमसमए घादिदसेसट्ठिदिसंतकम्मपमाणावहारण?मिदमाह * अपुवकरणस्स पढमसमए हिदिसंतकम्मादो चरिमसमए हिदिसंतकम्मं संखेजगुणहीणं । $१४३. किं कारणं ? अपुव्वकरणपढमसमए पुव्यणिरुद्ध तोकोडाकोडिमेत्तसाग अतिरिक्त शेष कर्मोंकी स्थितिमें उत्तरोत्तर हानि किसप्रकार होती है, अप्रशस्त कर्मोंके द्विस्थानीय अनुभागकी हानि भी किस विधिसे होती है और प्रत्येक स्थितिबन्धका काल कितना है इसका स्पष्टीकरण किया गया है। यह तो हम पहले ही बतला आये हैं कि गुणश्रेणिरचनाके समान ये तीनों ही कार्य अपूर्वकरणके प्रथम समयसे ही प्रारम्भ हो जाते हैं। इनमेंसे प्रत्येक स्थितिकाण्डकका उत्कीरण काल अन्तर्मुहूर्त है। ऐसे हजारों स्थितिकाण्डक अपूर्वकरणके कालके भीतर होते हैं। अपूर्वकरणके प्रथम समयमें जितनी स्थिति होती है उसमेंसे पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण उपरितन स्थितिको ग्रहणकर उसका फालिरूपसे प्रत्येक समयमें अपवर्तन करते हुए अन्तर्मुहूर्त कालके भीतर उसका अभाव करना एक स्थितिकाण्डकघात है। जैसे लकड़ीके एक कुन्देके कुछ भागके बराबर लम्बे अनेक फलक चीर लिये जाते हैं उसी प्रकार पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण स्थितिके तत्प्रमाण आयामवाली उत्कीरणकालके जितने समय हों उतनी फालियाँ करके एक-एक समयमें उनका अपवर्तन करते हुए अन्तर्मुहूर्त के अन्तिम समयमें पूरी काण्डकप्रमाण स्थितिका अपवर्तन करना स्थितिकाण्डकघात है । पुनः दूसरे अन्तर्मुहूर्तमें दूसरे स्थितिकाण्डकका उक्त विधिसे अपवर्तन करना दूसरा स्थितिकाण्डकघात है। इसी प्रकार अन्तिम समय तक हजारों स्थितिकाण्डकोंका अपवर्तनविधिसे घात होता है। यह तो स्थितिकाण्डकघातकी प्रक्रिया है। अनुभागकाण्डकघातकी प्रक्रिया भी इसी प्रकार है। इतनी विशेषता है कि एक-एक स्थितिकाण्डकके उत्कीरणकालमें हजारों अनुभागकाण्डकघात होते हैं। इनमेंसे प्रत्येक अनुभागकाण्डकका उत्कीरणकाल भी अन्तर्मुहूतप्रमाण है। इसी प्रकार स्थितिबन्धापसरणके विषय में भी समझ लेना चाहिए। इतनी विशेषता है कि एक स्थितिकाण्डकके उत्कीरणका जो काल है उतना ही एक स्थितिबन्धका काल है। अर्थात् इतने काल तक प्रति समय सदृश स्थितिका बन्ध होता है । स्थितिकाण्डकके बदलते ही दूसरा स्थितिबन्ध प्रारम्भ होता है। इस प्रकार अन्तर्मुहूर्त कालके भीतर जितने स्थितिकाण्डकघात होते हैं उतने ही स्थितिबन्धापसरण होते हैं । इसके अतिरिक्त स्थितिकाण्डकोंके विषय में विशेष खुलासा मूलमें किया ही है । अर्थात् प्रथम स्थितिकाण्डकसे दूसरा स्थितिकाण्डक विशेष हीन होता है, दूसरेसे तीसरा, तीसरेसे चौथा इस प्रकार अन्तिम स्थितिकाण्डक तक पूर्व-पूर्व स्थितिकाण्डकसे आगे-आगेका स्थितिकाण्डक विशेष हीन होता है । $ १४२. अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें घात करनेसे शेष स्थितिसत्कर्मके प्रमाणका निश्चय करनेके लिये इस सूत्रको कहते हैं * अपूर्वकरणके प्रथम समयके स्थितिसत्कर्मसे अन्तिम समयमें स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा हीन है। $ १४३. क्योंकि अपूर्वकरणके प्रथम समयमें जो पहलेकी अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरोपम
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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