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________________ गाथा ९४ ] दंसणमोहोवसामणा २६१ पाओग्गाणं हेट्ठिमयिसोहीणं सव्वेसु समाणत्ते णियमाणुवलंभादो। $ १२७. एवमपुव्वकरणपढमसमए पारद्धस्स द्विदिखंडयस्स पमाणविणिण्णयं कादूण संपहि तत्थेव द्विदिबंधपमाणावहारणहमिदमाह * हिदिबंधो अपुवो। $ १२८. अधापवत्तकरणचरिमसमयट्ठिदिबंधादो अपुव्वो अण्णो द्विदिबंधो पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागेण हीणो एण्हिमाढत्तो ति भणिदं होइ । संपहि एत्थेवापुव्वकरणपढमसमए अणुभागखंडयं पि घादेदुमाढवेइ । तं पुण केसि कम्माणं किं पमाणं वा होइ त्ति जाणावणमुत्तरं पबंधमाह * अणुभागखंडयमप्पसत्थकम्मंसाणमणंता भागा। १२९. अणुभागकंडयमप्पसत्थाणं चेव कम्माणं होइ पसत्थकम्माणं विसोहीए अणुभागवढिं मोत्तण तम्यादाणुववत्तीदो। तस्स पमाणं तक्कालभाविविट्ठाणाणुभागसंतकम्मस्साणंता भागा, अणुभागखंडयस्स करणपरिणामेहिं घादिज्जमाणस्स सेसवियप्पा स्तन विशुद्धियाँ सभी जीवोंमें समान होती हैं ऐसा कोई नियम नहीं है। विशेषार्थ-यहाँपर अपूर्वकरणमें प्राप्त विशुद्धियोंसे पूर्वकी सभी विशुद्धियोंको संसार अवस्थाके योग्य कहा है। इसका यह अर्थ नहीं है कि सम्यक्त्वके सन्मुख हुए जीवके जो अधःप्रवृत्तकरणसम्बन्धी विशुद्धि होती है वह भी संसार अवस्थाके योग्य है। किन्तु इसका केवल इतना ही अर्थ है कि जातिकी अपेक्षा जिस लक्षणवाले परिणाम अधःप्रवृत्तकरणमें होते हैं उस लक्षणवाले परिणाम अन्य संसारी जीवोंके भी हो सकते हैं। इसलिए उनके तारतम्यसे कर्मकी स्थितियोंमें भी विभिन्नता बनी रहती है और इसी कारण अपूर्वकरणके प्रथम समयमें स्थितिकाण्डक अनेक प्रकारकी स्थितियोंवाले बन जाते हैं। ६ १२७. इस प्रकार अपूर्वकरणके प्रथम समयमें प्रारम्भ किये गये स्थितिकाण्डकके प्रमाणका निर्णयकर अब वहींपर स्थितिबन्धके प्रमाणका निश्चय करनेके लिये इस सूत्रको कहते हैं * स्थितिबन्ध अपूर्व होता है। $ १२८. अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयके स्थितिबन्धसे पल्योपमका संख्यातवां भाग हीन अपूर्व अर्थात् अन्य स्थितिबन्धको यहाँ आरम्भ करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अब यहीं अपूर्वकरणके प्रथम समयमें अनुभागकाण्डकका भी घात करनेके लिये आरम्भ करता है। वह किन कर्मोंका होता है और उसका क्या प्रमाण है इस बातका ज्ञान करानेके लिये आगेके प्रबन्धको कहते हैं * अनुभागकाण्डक अप्रशस्त कर्मोंका अनन्त बहुभागप्रमाण होता है । $ १२९. अनुभागकाण्डक अप्रशस्त कर्मोका ही होता है, क्योंकि विशुद्धि के कारण प्रशस्त कर्मोंको अनुभागवृद्धिको छोड़कर उसका घात नहीं बन सकता । उस अनुभागकाण्डकका प्रमाण तत्कालभावी द्विस्थानीय अनुभागसत्कर्मके अनन्त बहुभागप्रमाण है, क्योंकि करण
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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