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________________ २५९ गाथा ९४ ] दसणमोहोवसामणा मणुभागबंधोसरणतदुक्कस्सीकरणलक्खणफलविसेसोवलंभादो त्ति वुत्तं होइ । ___ * हिदिबंधे पुण्णे पुण्णे अण्णं हिदिबंधं पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागहीणं बंधदि। १२४. एतदुक्तं भवति-अधापवत्तकरणपढमसमए चेव तदणंतरहेद्विमसमयट्ठिदिबंधादो तप्पाओग्गंतोकोडाकोडिपमाणादो पलिदोवमस्स संखेज्जदिमागेण परिहीणमण्णहिदिबंधमाढवेइ । पुणो एदं हिदिबंधमंतोमुहुत्तकालमवद्विदसरूवेण बंधमाणो तब्बंधगद्धा परिछिज्जदे, तत्तो अण्णं द्विदिबंधं पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागेण परिहीणमाढविय तं पि अंतोमुहुत्तकालमवढिदसरूवेण बंधइ । एवमेदेण कमेण पुण्णे पुण्णे द्विदिबंधे अण्णं दिदिबंधं पलिदोवमस्स संज्जदिभागेण- परिहीणं कादण बंधमाणो सगद्धाए संखेज्जसहस्समेत्ताणि द्विदिबंधोसरणाणि करेदि त्ति । उससे अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभागबन्धापसरण लक्षण और प्रशस्त प्रकृतियोंके अनुभागबन्धका उत्कृष्टीकरणलक्षण फलविशेष पाया जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। विशेषार्थ-इस जीवके पहले नरकादि किस गतिमें किन प्रकृतियोंका बन्ध होता है यह बतला आये हैं। यहाँ यह बतलाया है कि जिस गतिसम्बन्धी इस अवस्थामें जिन प्रकृतियोंका बन्ध होता है उनमेंसे अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभागबन्ध द्विस्थानीय होकर भी प्रत्येक समयमें अनन्तगुणा हीन होता जाता है और प्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभागबन्ध चतुःस्थानीय होकर भी प्रत्येक समयमें अनन्तगुणी वृद्धिरूप होता जाता है। * एक-एक स्थितिबन्धके पूर्ण पूर्ण होनेपर पल्योपमके संख्यातवें भागसे हीन अन्य-अन्य स्थितिबन्धको बाँधनेके लिये आरम्भ करता है। १२४. उक्त कथनका यह तात्पर्य है कि अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयमें ही उससे अनन्तर पूर्व अधस्तन समयमें होनेवाले तत्प्रायोग्य अन्तःकोड़ाकोड़ीप्रमाण स्थितिबन्धसे पल्योपर पा संख्यातवां भाग हीन अन्य स्थितिबन्धको आरम्भ करता है। पुनः इस स्थितिबन्धको अन्तर्मुहूर्त कालतक अवस्थितरूपसे बाँधनेबालेके उसका बन्धकाल क्षीण हो जाता है । पुनः उससे पल्योपमका संख्यातवां भागप्रमाण न्यून अन्य स्थितिबन्धका आरम्भकर उसे भी अन्तर्मुहूर्तकालतक अवस्थितरूपसे बाँधता है। इसप्रकार इस क्रमसे स्थितिबन्धके पुनः पुनः पूर्ण होनेपर पल्योपमका संख्यातवां भागप्रमाण हीन अन्य स्थितिबन्धको प्रारम्भकर बन्ध करता हुआ उक्त जीव अधःप्रवृत्तकरण कालके भीतर संख्यात हजार स्थितिबन्धापसरण करता है। विशेषार्थ-अधःप्रवृत्तकरणका जो अन्तर्मुहूर्त काल है उसके एक स्थितिबन्धापसरणके कालप्रमाण संख्यात हजार खण्ड करे । उनमेंसे प्रत्येक खंडका प्रमाण भी अन्तर्मुहूर्त होता है। इसप्रकार अधःप्रवृत्तकणके कालके जितने खण्ड हुए उतने उस कालमें स्थितिबन्धापसरण होते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थितिबन्धापसरणमें पूर्व-पूर्वके स्थितिबन्धके प्रमाणमेंसे पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण स्थिति कम हो-होकर बन्ध होता है यह उक्त सूत्रका तात्पर्य है।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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