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________________ गाथा ९४ ] दंसणमोहोवसामणा २५७ $ ११९. एवं तिन्हं करणाणं लक्खणं परूविय संपहि देहिं करणेहिं अणादियमिच्छादिट्ठिस्स दंसणमोहोवसामणाविहाणं परूवेमाणो तव्त्रिसयमेव पइण्णाबक्कमाह* अणादियमिच्छादिट्ठिस्स उवसामगस्स परूवणं वत्तइस्सानो । $ १२०. दंसणमोहउवसामणाए पट्टवगो अणादियमिच्छाइट्ठी वा होज्ज सादियमिच्छाइट्ठी वा वेदगपाओग्गभावं वोलिय अट्ठावीसं सत्तावीसं छव्वीसाणमण्णदरकम्मंसिओ होण पुणो सम्मत्तग्गहणाहिमुहो होज्जं ति । तत्थ ताव अणादियमिच्छादिट्ठिमस्सियूण परूवणं वत्तइस्सामो, सादियमिच्छादिट्ठिउवसामयपरूवणाए तप्परूवणादो चे गयत्थत्तदंसणादोत्ति भणिदं होइ * तं जहा । करणके कालके जितने समय हैं, परिणाम भी उतने ही हैं, न न्यून हैं और न अधिक हैं । ऐसा होते हुए भी ये परिणाम उत्तरोत्तर अनन्तगुणी वृद्धिरूपसे ही अवस्थित हैं । इसका आशय यह है कि जिस प्रकार अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्वकरणके एक समय में होने वाले परिणामों में उत्तरोत्तर अनन्तभागवृद्धि, असंख्यात भागवृद्धि आदि बन जाती है । उस प्रकारकी व्यवस्था यहाँ एक समयवर्ती परिणामभेद न होनेके कारण इन परिणामोंकी न होकर यहाँ प्रथम समय के परिणामसे दूसरे समयका परिणाम तथा द्वितीयादि समयोंके परिणामोंसे तृतीयादि समयोंके परिणाम उत्तरोत्तर अनन्तगुणी वृद्धिको लिये हुए ही हैं । इस प्रकार यह अनिवृत्तिकरणका स्वरूप है । $ ११९. इस प्रकार तीनों करणोंके लक्षणोंका कथन कर अब इन करणोंके द्वारा अनादि मिथ्यादृष्टि जीवके दर्शनमोहनीयकर्मकी उपशामनाविधिका कथन करते हुए तद्विषयक ही प्रतिज्ञावाक्यको कहते हैं * अब अनादि मिथ्यादृष्टि उपशामककी प्ररूपणा बतलाते हैं । $ १२०. दर्शनमोहकी उपशामनाका प्रस्थापक अनादि मिथ्यादृष्टि जीव भी होता है और वेदकसम्यक्त्वके योग्य भावको उल्लंघन कर अट्ठाईस, सत्ताईस तथा छव्वीस इनमें से अन्यतर प्रकृतियोंकी सत्तावाला होकर सादि मिथ्यादृष्टि भी सम्यक्त्व ग्रहण के अभिमुख होता है। उ सर्व प्रथम अनादि मिध्यादृष्टि जीवके आश्रयसे कथन करेंगे, क्योंकि सादि मिथ्यादृष्टि उपशामककी प्ररूपणाका ज्ञान अनादि मिथ्यादृष्टि उपशामककी प्ररूपणासे ही होता हुआ देखा जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । विशेषार्थ – सभी सादि मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणके पात्र नहीं होते । किन्तु जिन्होंने कमसे कम वेदकसम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण कालको उल्लंघन कर लिया है ऐसे मोहनीयकर्मकी २८, २७ या २६ प्रकृतियोंकी सत्तावाले मिथ्यादृष्टि जीव ही दर्शनमोहनीय की उपशामना करनेमें समर्थ होते हैं । यहाँ यद्यपि अनादि मिथ्यादृष्टि जीव दर्शनमोहनीयको उपशामना किस प्रकार करते हैं यह प्रमुखता से बतलाया जा रहा है, पर उससे सादि मिध्यादृष्टि जीवोंके दर्शनमोहनीयकी उपशामना किस प्रकार से होती है इसका मी ज्ञान हो जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है | * वह जैसे । ३३.
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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