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________________ २५६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगद्दारं १० ६ ११६. संपहि अणियट्टिकरणस्स लक्खणट्ठपरूवणमुत्तरसुत्तमाह * अणियट्टिकरणे समए समए एक्केक्कपरिणामट्ठाणाणि अणंतगुणाणि च । ११७. अणियट्टिकरणपढमसमयप्पहुडि जाव चरिमसमओ ति ताव एक्केक्कं चेव परिणामट्ठाणं होइ । तत्थेगसमयम्मि परिणामभेदाभावेहिं होतं पि समयं पडि अणंतगुणकमेणेवावडिदं दट्ठव्वं, तत्थ पयारंतरासंभवादो। तम्हा अणियट्टिकरणम्मि अंतोमुहुत्तमेत्ताणि चेव परिणामट्ठाणाणि अणंतगुणसरूवेणावट्ठिदाणि होति ति एसो एदस्स सुत्तस्स मावत्यो। * एदमणियट्टिकरणस्स लक्खणं । 5 ११८. सुगममेदमुवसंहारवक्कं । ___६ ११६. अब अनिवृत्तिकरणके लक्षणके अर्थका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रको कहते हैं * अनिवृत्तिकरणके प्रत्येक समयमें एक-एक परिणामस्थान होता है तथा वे सब परिणामस्थान उत्तरोत्तर अनन्तगुणित होते हैं। ६११७. अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयसे लेकर अन्तिम समय तक एक-एक परिणामस्थान ही होता है। वहाँ एक समयमें परिणाम भेद नहीं है, फिर भी प्रत्येक समयमें होने वाला वह परिणाम उत्तरोत्तर अनन्तगुणित क्रमसे ही अवस्थित है ऐसा जानना चाहिए, क्योंकि वहाँ दूसरा प्रकार सम्भव नहीं है। इसलिये अनिवृत्तिकरणमें अन्तर्मुहूर्तप्रमाण ही परिणामस्थान अनन्तगुणितस्वरूपसे अवस्थित हैं यह इस सूत्रका भावार्थ है। * यह अनिवृत्तिकरणका लक्षण है। ६ ११८. यह उपसंहारवाक्य सुगम है। विशेषार्थ—यहाँ अनिवृत्तिकरणके स्वरूपका निर्देश करते हुए बतलाया है कि इस करणका काल भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है जो अपूर्वकरणके कालके संख्यातवें भागप्रमाण है। पहले अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्वकरणमें अपने-अपने कालके भीतर होनेवाले सब परिणामोंका योग असंख्यात लोकप्रमाण बतला आये हैं और प्रत्येक समयमें होनेवाले परिणाम भी उत्तरोत्तर सदृश वृद्धिरूपसे अवस्थित असंख्यात लोकप्रमाण बतला आये हैं। किन्तु वह व्यवस्था अनिवृत्तिकरणमें नहीं है। किन्तु इस करणका जितना काल है उसमें होनेवाले परिणाम भी उतने ही हैं जो उत्तरोत्तर अनन्तगुणी विशुद्धिको लिये हुए हैं। तात्पर्य यह है कि यहाँ नाना जीवोंकी अपेक्षा भी विवक्षित समयमें वही परिणाम होता है जो दूसरे आदि जीवोंका उस समयमें पहले अतीत कालमें हुआ है, वर्तमान समयमें है या भविष्यमें होगा। इसमें न तो गतिभेद बाधक है, न लेश्याभेद बाधक है, न संस्थानभेद बाधक है और न वेदभेद ही बाधक है। एक समयमें स्थित नाना जीवोंका एक ही परिणाम होता है और भिन्न समयमें स्थित जीवोंका भिन्न ही परिणाम होता है । इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि इस १. ता०प्रतो -कमेण वावड्डिदं इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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