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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ सम्मत्ताणियोगद्दार १० $ ९३. संपहि अप्पात्रहुअपरूवणं कस्सामो । तं च दुविहमप्पाचहुअं सत्थाणपरत्थाणभेदेण । तत्थ ताव सत्थाणप्पा बहुअं कस्सामा । तं जहा - अधापवत्तकरणपढमसमयम्मि पढमखंडजहण्णपरिणामो थोवो । तत्थेव विदियखंडजहण्णपरिणामो अनंतगुणो । तदियखंडजहण्णपरिणामो अनंतगुणो । एवं णेदव्वं जाव चरिमखंडजहणपरिणामो अनंतगुणो त्ति । एवं पढमसमयपरिणामखंडाणं जहण्णपरिणाम २४४ णाणि चैव अस्सिऊण सत्थाणप्पा बहुअं कदं । संपहि पढमसमयम्मि पढमखंडस्स उक्कस्सपरिणामो थोवो । तत्थेव विदियखंडउक्कस्सपरिणामो अनंतगुणो । तदियखंडकस्सपरिणामो अनंतगुणो । एवमुवरि वि णेदव्वं जाव चरिमखंडउकस्स परिणामो अतगुणोति । एवं पढमसमय सव्वखंडाण मुक्कस्सपरिणामे अस्सियूण सत्थाणप्पाबहुअं भणिदं । एवं चैव विदियसमय पहुडि खंडं पडि ट्ठिदजहण्णुकस्स परिणामाणं सत्थाणप्पाचहुअमणुगंतव्वं जाव अधापवत्तकरणचरिमसमयो ति । तदो सत्थाणप्पाबहुअं गदं । संपहि परत्थाणप्पा बहुअपरूवणट्टमुवरिमं सुत्तपबंधमाह - जो ४१ परिणाम हैं वे प्रथम समयके समान द्वितीय और तृतीय समय में भी पाये जाते हैं, इससे अगले समय में नहीं और इसी प्रकार प्रथम समयके चौथे खण्डके जो ४२ परिणाम हैं वे प्रथम समग्र से लेकर चौथे समय तक ही पाये जाते हैं, इससे अगले समयों में नहीं । इस प्रकार प्रथम समयके परिणामोंकी अनुकृष्टि उक्त अंक संदृष्टिके अनुसार चौथे समय तक बनती है, इससे आगे नहीं । तथा चौथे समयसे आगे प्रथम समय में पाये जानेवाले परिणामों की निर्वृत्ति हो जाती है, इसलिये इससे आगे प्रथम समयके परिणामोंकी व्युच्छित्ति हो जाने से निर्वर्गणाकाण्डकका प्रमाण भी ४ समयप्रमाण ही प्राप्त होता है । यह प्रथम समयके परिणामोंकी व्यवस्था है । द्वितीयादि समयों में पाये जानेवाले परिणामोंकी व्यवस्था भी उक्त पद्धति से कर लेनी चाहिए, विशेष वक्तव्यं न होनेसे यहाँ पृथक-पृथक मीमांसा नहीं की है । शेष स्पष्टीकरण मूलसे ही हो जाता है । § ९३. अब अल्पबहुत्वका कथन करेंगे । वह अल्पबहुत्व स्वस्थान और परस्थानके भेदसे दो प्रकारका है । उनमें से सर्वप्रथम स्वस्थान अल्पबहुत्वका कथन करेंगे। यथाअधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समय में प्रथम खण्डका जघन्य परिणाम सबसे स्तोक है। उससे वहीं पर द्वितीय खण्डका जघन्य परिणाम अनन्तगुणा है। उससे वहीं पर तीसरे खण्डका जघन्य परिणाम अनन्तगुणा है । इस प्रकार वहीं पर अन्तिम खण्डका जघन्य परिणाम अनन्तगुणा है इस स्थानके प्राप्त होने तक जानना चाहिए । इस प्रकार मात्र प्रथम समयके परिणामखण्डोंके जघन्य परिणामस्थानोंका अवलम्बन लेकर स्वस्थान अल्पबहुत्व किया । अब प्रथम समय में प्रथम खण्डका उत्कृष्ट परिणाम स्तोक है। उससे वहीं पर दूसरे खण्डका उत्कृष्ट परिणाम अनन्तगुणा है। उससे वहीं पर तीसरे खण्डका उत्कृष्ट परिणाम अनन्तगुणा है । इसी प्रकार आगे भी अन्तिम खण्डका उत्कृष्ट परिणाम अनन्तगुणा है इस स्थानके प्राप्त होने तक कथन करना चाहिए। इस प्रकार प्रथम समय के सब खण्डोंके उत्कृष्ट परिणामोंका आलम्बन लेकर स्वस्थान अल्पबहुत्वका कथन किया। इसी प्रकार दूसरे समय से लेकर अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समय तक प्रत्येक खण्डके प्रति प्राप्त जघन्य और उत्कृष्ट परिणामोंका स्वस्थान अल्पबहुत्व जानना चाहिए । इसके बाद स्वस्थान अल्पबहुत्वका कथन समाप्त T
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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