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________________ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे | सम्मत्ताणियोगद्दारं १० $ ८९. संपहिएदेसिं परिणामट्ठाणाणं पढमसमयप्पहुडि उवरि जहाकमं विसेसाहियकमेण ठेवणा एवमणुगंतव्वा । तं जहा -- -पढमसमय अधापचत्त करणस्य जाणि परिणामट्ठाणाणि ताणि अंतोमुहुत्तस्स जत्तिया समया तत्तियमेत्ताणि खंडाणि कायव्वाणि । किंपमाणमेदमंतो मुहुत्त मिदि पुच्छिदे सगद्धाए संखेजदिभागमेत्तं । तमेव णिव्वग्गणकंडयमिदि घेत्तव्वं । विवक्खिय समयपरिणामाणं जत्तो परमणुकट्टिवोच्छेदों तं णिव्वग्गणकंडयमिदि भण्णदे | संपहि एदाणि खंडाणि किमण्णोष्णं सरिसाणि, आहो विसरिसाणिति पुच्छिदे सरिसाणि ण होंति, विसरिसाणि चेवे त्ति घेत्तव्त्रं, अण्णोष्णं पेक्खियूण जहाकममेदेसिं विसेसाहियकमेणावद्वाणदंसणादो । एसो विसेसो अंतोमुहुत्तपडिभागिओ । पुणो एदाणि चेव परिणामट्ठाणाणि पढमखंडवज्जाणि विदियसमए परिवाडिमुल्लंघिय ठवेयव्वाणि । णवरि अण्णाणि च अपुव्वाणि परिणामट्ठाणाणि असंखेज्जलोग मेत्ताणि पढमसमय चरिमखंड परिणामेहिंतो अंतोमुहूतपडिभागेण २३६ परिणामों में भी पाई जाती है और अधःप्रवृत्तकरण परिणामों में भी पाई जाती है । अन्तर इतना है कि संसार अवस्थामें इस अनुत्कृष्टिका काल पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण है क्योंकि जघन्य स्थितिबन्धके योग्य जो परिणाम होते हैं उनके सद्भावमें पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाणस्थितिविशेषोंकी उपलब्धि देखी जाती है । परन्तु अधःप्रवृत्तकरण में इस अनुकृष्टिका काल अन्तर्मुहूर्तमात्र अवस्थितस्वरूप है, क्योंकि यह काल अधःप्रवृत्तकरणके कालके संख्यातवें भागप्रमाण है । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए बतलाया है कि अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समय में जो असंख्यात लोकप्रमाण परिणामस्थान होते हैं, उनमेंसे प्रारम्भके एक खण्डप्रमाण परिणामोंको छोड़कर दूसरे समय में भी अन्य अपूर्व परिणामस्यानोंके साथ वे परिणामस्थान पाये जाते हैं। इस प्रकार यह क्रम अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समय तक जानना चाहिए | इस विषयका विशेष खुलासा आगे करेंगे । $ ८९. अव प्रथम समयसे लेकर यथाक्रम विशेष अधिकके क्रमसे इन परिणामस्थानोंकी स्थापना इस प्रकार जाननी चाहिए। यथा - अधः प्रवृत्तकरणके प्रथम समय में जो परिणामस्थान होते हैं उन्हें अन्तर्मुहूर्त कालके जितने समय हैं मात्र उतने खण्डप्रमाण करना चाहिए । शंका- इस अन्तर्मुहूर्तका क्या प्रमाण है ? समाधान – अपने कालके संख्यातवें भागप्रमाण है । ant निर्वणाकाण्ड है ऐसा ग्रहण करना चाहिए । विवक्षित समयके परिणामोंका जिस स्थान से आगे अनुकृष्टिका विच्छेद होता है वह निर्वर्गणाकाण्डक कहा जाता है । अब ये खण्ड परस्पर क्या सदृश होते हैं या विसदृश होते हैं ऐसा पूछने पर सदृश नहीं होते हैं, विसदृश ही होते हैं ऐसा ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि एक-दूसरेको देखते हुए ये यथाक्रम विशेष अधिकक्रमसे ही अवस्थित देखे जाते हैं। यह विशेष अन्तर्मुहूर्त का भाग देने पर जो लब्ध आवे उतना है । पुनः प्रथम खण्डको छोड़कर इन्हीं परिणामस्थानोंको दूसरे समय में परिपाटीको उल्लंघन कर स्थापित करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इस दूसरे समय में असंख्यात लोकप्रमाण अन्य अपूर्व परिणामस्थान होते हैं जो प्रथम समय के अन्तिम खण्डके १. ता० प्रती प्रायः सर्वत्र 'कंडय' स्थाने 'खंडय' इति पाठः । २. ता० प्रती जत्तो परमाणाणुक विच्छेद इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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