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________________ गाथा ९४ ] दंसणमोहोवसामणा २३३ * एदाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ अधापवत्तकरणस्स पढमसमए परूविदाओ । ९ ८३. गयत्थमेदं सुतं । संपहि 'दंसणमोहउवसामगस्स परिणामो केरिसो भवे' इच्चेदं सुत्तपदमस्सियूण दंसणमोहोवसामगस्स करणलद्धिपरूवणट्ट मुवरिमो पबंधो । * दंसणमोहउवसामगस्स तिविहं करणं । $ ८४. येन परिणामविशेषेण दर्शन मोहोपशमादिर्विवक्षितो भावः क्रियते निष्पाद्यते स परिणामविशेषः करणमित्युच्यते । तं पुण करणमेत्थ तिविहं होइ त्ति देण सुत्तेण जाणाविदं । संपहि तेसिं तिण्डं करणाणं णामणिद्देसं कुणमाणो पुच्छावकमाह* तं ज्रहा । ८५. सुगमं । - * अधापवत्तकरणमपुव्वकरणमणियहिकरणं च । $ ८६. एवमेदाणि तिण्णि करणाणि एत्थ होंति त्ति भणिदं होइ । संपहि एदेसिं तिन्हं करणाणं किंचि अत्थपरूवणं कस्सामो । तं जहो – जम्हि वट्टमाणस्स जीवस्स करणपरिणामा अधो हेट्ठा पवत्तंति तमधापवत्तकरणं णाम । एदम्मि करणे उवरिमसमयपरिणामा हेट्ठिमसमयेसु वि व ंति त्ति भणिदं होइ । समयं पडि अपुव्वा * इन चार गाथाओंकी अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समय में प्ररूपणा करनी चाहिए । $ ८३. यह सूत्र गतार्थ है । अब 'दर्शनमोहके उपशामकका परिणाम कैसा होता है ।' इस प्रकार इस सूत्र पदका आलम्बन लेकर दर्शनमोहके उपशामककी करणलब्धिका कथन करनेके लिये आगेका प्रबन्ध कहते हैं * दर्शनमोहके उपशामकके तीन करण होते हैं । $ ८४. जिस परिणामविशेषके द्वारा दर्शनमोहका उपशमादिरूप विवक्षित भाव किया जाता है अर्थात् उत्पन्न किया जाता है वह परिणाम करण कहलाता है । वह करण यहाँ पर तीन प्रकारका होता है यह इस सूत्र द्वारा ज्ञात कराया गया है । अब उन तीन करणोंका नामनिर्देश करते हुए पृच्छावाक्यको कहते हैं— * वे जैसे । $ ८५. यह सूत्र सुर्गम है । * अधःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण | $ ८६. इस प्रकार ये तीन करण यहाँपर होते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अब इन तीन करणोंके अर्थका किंचित् प्ररूपण करते हैं । यथा - जिस करणमें विद्यमान जीवके करणपरिणाम 'अधः' नीचे अर्थात् उपरितन ( आगे के ) समयके परिणाम नीचे ( पूर्व ) के समय के परिणामों के समान प्रवृत्त होते हैं वह अधःप्रवृत्तकरण है । इस करण में उपरिम समयके परिणाम नीचेके समयों में भी पाये जाते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । जिस १. ता०प्रतो तं जहा इति पाठो नास्ति । ३०
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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