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________________ २३२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगदारं १० * तदो इमस्स चरिमसमयअधापवत्तकरणे वट्टमाणस्स पत्थि हिदिघादो वा अणुभागघादो वा । से काले दो वि घावा पवत्तीहित्ति । ८२. जदि एसो पडिसमयमणंतगुणाए विसोहीए सुट्ठ वि विसुज्झमाणो संतो द्विदि-अणुभागखंडयघादपाओग्गविसोहीओ ण पावदि, हेट्ठा चेव वद्ददि, तदो इमस्स चरिमसमयाधापवत्तकरणभावे वट्टमाणस्स पत्थि द्विदिघादो अणुभागधादो वा। किंतु से काले अपुव्वकरणं पविट्ठपढमसमए दो वि एदे द्विदि-अणुभागविसयघादा गुणसेढिणिक्खेवादिसहगदा पवत्तीहिंति । तम्हा तत्थेव तप्परूवणं कस्सामो त्ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्थो। ___ * अतः अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें विद्यमान इस जीवके स्थितिघात और अनुभागघात नहीं होता, किन्तु तदनन्तर समयमें दोनों ही घात प्रवृत्त होंगे । ६८२. यद्यपि यह जीव प्रत्येक समयमें अनन्तगुणी विशुद्धिसे अत्यन्त विशुद्ध होता हुआ भी स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघातके योग्य विशुद्धिको नहीं प्राप्त होता, नीचे ही रहता है, इसलिये अधःप्रवृत्तकरणभावमें विद्यमान इसके स्थितकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात नहीं होता। किन्तु तदनन्तर समयमें अपूर्वकरणके प्रथम समयमें प्रविष्ट होनेपर गुणश्रेणिनिक्षेप आदिके साथ स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात प्रवृत्त होंगे, इसलिये वहीं पर उनका कथन करेंगे यह इस सूत्रका भावार्थ है। विशेषार्थ-क्षयोपशम आदि चार लब्धियोंसे संयुक्त जो जीव दर्शनमोहका उपशम करनेके सन्मुख होकर अधःप्रवृत्तकरणमें प्रविष्ट होता है उसके प्रथम समयसे लेकर इस करणके अन्तिम समय तक प्रत्येक समयके परिणामोंमें उत्तरोत्तर अनन्तगुणी विशुद्धि होती जाती है। इस जीवके अपने कालके भीतर प्रत्येक समयमें अप्रशस्त कर्मोंका अनन्तगुण हीन द्विस्थानीय और प्रशस्त कोका अनन्तगुणा चतुःस्थानीय अनुभागबन्ध होता रहता है । तथा एक स्थितिबन्धका समय पूर्ण होनेपर दूसरा स्थितिबन्ध पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण कम होकर अन्तर्मुहूर्त काल तक होता है। इसी क्रमसे तीसरा, चौथा आदि जानना चाहिए । इसप्रकार इस करणमें संख्यात हजार स्थितिबन्धापसरण होते हैं। किन्तु इन परिणामोंको निमित्तकर स्थितिकाण्डकघात, अनुभागकाण्डकघात, गुण-श्रेणि रचना और गुणसंक्रम ये चार आवश्यक नहीं होते। यहाँ अपूर्वकरणमें स्थिति काण्डकघात, अनुभागकाण्डकघात और गुणश्रेणि रचना होती है। यह उक्त कथनका तात्पर्य है। उपरितन एक काण्डक-प्रमाण स्थितिका फालिक्रमसे अन्तर्मुहूर्तकालमें घात करना स्थितिकाण्डकघात कहलाता है, अप्रशस्त प्रकृतियोंके उपरितन एक काण्डक प्रमाण बहुभाग अनुभागका फालिक्रमसे अन्तर्मुहूर्तकालमें घात करना अनुभागकाण्डकघात कहलाता है। आयुके सिवाय शेष कोंके उपरितन स्थितियों में स्थित कर्मपुंजमें अपकर्षण-उत्कर्षण भागहारका भाग देनेपर जो एक भाग द्रव्य प्राप्त हो, उसमें असंख्यात लोकका भाग देनेपर प्राप्त हुआ एक भागप्रमाण उदयवाली प्रकृतियोंका द्रव्य उदयावलिमें निक्षिप्त करना तथा उदयवाली व अनुदयवाली शेष प्रकृतियोंके द्रव्यको गुणितक्रमसे उदयावलिके अनन्तर समयवर्ती निषेकसे लेकर गुणश्रेणिशीर्ष तक निक्षिप्त करना गुणश्रेणि रचना कहलाती है। इन सबका विशेष विचार आगे किया ही हैं । यहाँ मात्र उनका स्वरूप बतलानेके लिये संक्षेपमें निर्देश किया है।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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