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________________ गाथा ९४ ] दंसणमोहोवसामणा २२७ आदाव-थावर - सुहुम-अपज्जत-साहारणसरीरणामाणि एदाणि उदएण वोच्छिष्णाणि । $ ६८. एत्थ पंचदंसणावरणीयणिदेसेण णिद्दामेदाणं पंचण्हं गहणं कायव्वं, तेसमेत्युदय वोच्छेदो । किं कारणं ? दंसणमोहुवसामगस्स सागर - जागारावत्थस्स तदुदयपरिणामविरोहा दो । एवं चदुजादिआदीणं पि सुत्तणिद्दिट्ठपयडीणमुदय वोच्छेदो वतव्वो । 1 $ ६९. एवमोघेण परूविदस्सेदस्सत्थस्स पुणो वि फुडीकरणट्टमादेसपरूवणा कीरदे । तं जहा – आदेसेण चदुसु गदीसु वि पंचणाणावरणीयाणं णत्थि उदयेण झीदा । दंसणावरणीयस्स चत्तारि पयडीओ उदएण अज्झीणाओ । वेदणीयस्स सादासादाणं णत्थि उदएण झीणदा । मोहणीयस्स सव्वासि पयडीणं णत्थि उदएण झीणदा । णवरि णेरइएस इत्थि - पुरिसवेदाणमुदएण झीणदा । देवेसु णपुंसय वेदस्स उदएण झीणदा वत्तव्या । आउस्स सव्वासि पयडीणं णत्थि उदयवोच्छेदो । णवरि नाककर्म ये प्रकृतियाँ उदयसे आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणशरीर व्युच्छिन्न होती हैं । $ ६८. यहाँ सूत्र में पाँच दर्शनावरण पदके निर्देशसे निद्रादि पाँच भेदोंका ग्रहण करना चाहिए, उनकी इसके उदय व्युच्छित्ति है, क्योंकि साकार उपयोग और जागृत अवस्थाविशिष्ट दर्शनमोह - उपशामकके इन पाँच निद्रादिके उदयरूप परिणामका विरोध है । इसी प्रकार सूत्रमें निर्दिष्ट की गई चार जाति आदि प्रकृतियोंकी उदय के अभावका भी कथन करना चाहिए । विशेषार्थ दर्शन मोहका उपशामक वही जीव हो सकता है जो संज्ञी, पचेन्द्रिय और पर्याप्त होकर जीवादि नौ पदार्थोंके यथार्थ ज्ञानके साथ अपने साकार उपयोग द्वारा जीवादि नौ पदार्थों में अनुस्यूत एकमात्र जीवपदार्थके अनुमननके सन्मुख हो । ऐसा जीव नियमसे जागृत होता है, इसलिये तो उसके निद्रादि पाँच दर्शनावरण प्रकृतियोंके उस कालमें उदयका निषेध किया है। साथ ही उसके संज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त एकमात्र यही जीवसमास होता है, इसलिये उसके एकेन्द्रिय आदि चार जाति आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण इन प्रकृतियोंके उदयका निषेध किया है। यहाँ सूत्रमें पाँच दर्शनावरण आदिके मात्र उदयका निषेध किया है । परन्तु इससे इन प्रकृतियोंकी उदीरणाका भी निषेध जान लेना चाहिए, क्योंकि कुछ अपवादों को छोड़कर सर्वत्र उदीरणा उदयकी अविनाभाविनी होती है । ६९. इस प्रकार ओघसे कहे गये इस अर्थका फिर भी स्पष्टीकरण करनेके लिये आदेशप्ररूपणा करते हैं । यथा - आदेशसे चारों ही गतियोंमें पाँच ज्ञानावरण प्रकृतियोंका उदयविच्छेद नहीं है । दर्शनावरणकी चार प्रकृतियोंका उदयविच्छेद नहीं है । वेदनीय की साता और असाता इन दोनों प्रकृतियोंका उदयविच्छेद नहीं है । मोहनीयकी सब प्रकृतियोंका उदयविच्छेद नहीं है । इतनी विशेषता है कि नारकियों में स्त्रीवेद और पुरुषवेदका उदय नहीं होता । तथा देवोंमें नपुंसकवेदका उदय नहीं होता ऐसा कहना चाहिए। आयुकी सभी
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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