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________________ २२६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगद्दारं १० पयडीओ बंधेण झीणाओ, ण सेसाओ । गोदस्स णीचागोदं बंधेण वोच्छिण्णं, णेदरं । अंतराइयस्स णत्थि एत्थ पयडिबंधस्स झीणदा। सत्तमाए एवं चेव । णवरि उज्जोवं सिया बंधेण झीणं सिया णोझीणं । तिरिक्खगइ-तप्पाओगाणु०-णीचागोदाणि च बंधेण णोझीणाणि । मणुसगइ-तप्पाओग्गाणुपुन्वि-उच्चागोदाणि बंधेण झीणाणि । ६६. जइ तिरिक्खो मणुस्सो वा तो तस्स णामस्स देवगदि-पंचिंदियजादिवेउव्विय-तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण-वेउव्वियअंगोवंग-वण्णादि४-देवगइपाओग्गाणुपुव्वि - अगुरुलहुआदि४ - पसत्थविहायगदि-तसादि४ -थिरादि६ - णिमिणणामाणि मोत्तूण सेसाणि बंधेण झीणाणि । गोदस्स णीचागोदं बंधेण झीणं । सेसं पुव्वं व वत्तव्यं । देवगदीए पढमपुढविभंगो । एसा पयडिबंधझीणदा णाम ।। ६७. एदासिं चेव पयडीणं पयडिझीणदाए समुट्ठिाणं द्विदिबंधझीणदा च अणुमग्गियव्वा । अज्झीणबंधाणं पि पयडीणमंतोकोडाकोडीदो उवरिमट्ठिदिबंधवियप्पाणं झीणदा समयाविरोहेणाणुगंतव्वा । एवमणुभाग-पदेसविसए वि एमो अत्थो जोजेयव्वो। एवं ताव पयडिवंधवोच्छेदं द्विदि-अणुभाग-पदेसबंधवोच्छेदगम्भं परूविय संपहि पयडिविसयमुदयवोच्छेदं परूवेमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * पंचदंसणावरणीय-चदुजादिणामाणि चदुआणुपुग्विणामाणि प्रकृति बन्धसे विच्छिन्न है, उच्चगोत्र नहीं। अन्तरायकर्मके प्रकृतिबन्धका विच्छेद यहाँ नहीं है। सातवीं पृथिवीमें इसी प्रकार जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि उद्योतप्रकृति कदाचित् बन्धसे विच्छिन्न है, कदाचित् विच्छिन्न नहीं है। तिर्यश्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी और नीचगोत्र ये बन्धसे विच्छिन्न नहीं हैं । मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और उच्चगोत्र ये बन्धसे विच्छिन्न हैं। __$ ६६. यदि तिर्यश्च और मनुष्य है तो उसके नामकर्मकी देवगति, पश्चेन्द्रिय जाति वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीर आंगोपांग, वर्णादिचतुष्क, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु आदि चार, प्रशस्त विहायोगति, सादि चार, स्थिरादि छह और निर्माण इन प्रकृतियोंको छोड़कर शेष प्रकृतियाँ बन्धसे विच्छिन्न हैं। गोत्रकर्मकी नीचगोत्र प्रकृति बन्धसे विच्छिन्न है। शेष कथन पहलेके समान कहना चाहिए । देवगतिमें पहली पृथिवीके समान भंग है। यह प्रकृतिबन्धसम्बन्धी विच्छिन्नताका निर्देश है। ६६७. प्रकृतिबन्धविच्छिन्नतारूपसे निर्दिष्ट इन्हीं प्रकृतियोंकी स्थितिबन्धकी अपेक्षा विच्छिन्नताका अनुमार्गण कर लेना चाहिए। तथा जिन प्रकृतियोंकी बन्धव्युच्छित्ति नहीं होती उन प्रकृतियोंकी अन्तःकोड़ाकोड़ीसे उपरिम स्थितिबन्धविकल्पोंकी विच्छिन्नता समय के अविरोधरूपसे जान लेना चाहिए। इसीप्रकार अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्धके विषयमें भी यह अर्थ योजित करना चाहिए । इस प्रकार स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्धकी बन्धव्युच्छित्ति जिसमें गर्भित है ऐसे प्रकृतिबन्धकी व्युच्छित्तिका कथन कर अब प्रकृतिविषयक उदयव्युन्छित्तिका कथन करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * पाँच दर्शनावरण, चार जाति नामकर्म, चारों आनुपूर्वी नामकर्म तथा
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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