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________________ गाथा ९४] दसणमोहोवसामणा २१७ * छण्हं संघडणाणं अण्णदरस्स सिया। ६५१. पवेसगो त्ति एत्थ अहियारसंबंधो, तेण छण्हं संघडणाणमण्णदरस्स सिया एसो पवेसगो, सिया च ण पवेसगो ति सुत्तत्थसंबंधो कायव्यो । जइ तिरिक्खो मणुस्सो वा पढमसम्मत्तं पडिवज्जइ तो एदेसिमण्णदरस्स णियमा पवेसगो होइ । अह देवो णेरइओ वा उवसमसम्मत्ताहिमुहो होइ तो णियमा एदेसिमपवेसगो। ति घेत्तव्वं । ___ * उज्जोवस्स सिया। ५२. पवेसगो त्ति पुव्वं व अहियारसंबंधो एत्थ कायव्यो। कुदो वुण उजोवस्स सिया पवेसगत्तमिदि चे ? ण, पंचिंदियतिरिक्खेसु चेव केसि पि जीवाणं तदुदहन्लाणं तप्पवेसयत्तदसणादो। * दो विहायगइ-सुभग-दूभग-सुस्सर-दुस्सर-आदेव-अणावेजजसगित्ति-अजसगित्ति० अण्णदरस्स पवेसगो । * छह संहननोंमेंसे कदाचित् किसी एकका प्रवेशक होता है । ६५१. 'पवेसगो' इस पदका यहाँ पर अधिकारवश सम्बन्ध कर लेना चाहिए, इसलिये छह संहननोंमेंसे यह जीव किसी एकका कदाचित् प्रवेशक होता है और कदाचित् प्रवेशक नहीं होता इस प्रकार सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्ध कर लेना चाहिए। यदि तिर्यश्च अथवा मनुष्य प्रथम सम्यक्त्वको प्राप्त होता है तो इनमेंसे किसी एकका नियमसे प्रवेशक होता है। और यदि देव अथवा नारकी उपशम सम्यक्त्वके अभिमुख होता है तो नियमसे इनका अप्रवेशक होता है ऐसा यहाँ पर ग्रहण करना चाहिए। विशेषार्थ-वैक्रियिकशरीरका संस्थान तो होता है पर संहनन नहीं होता, अतः यहाँ देव और नारकियोंको छहों संहननोंमेंसे किसी एक भी प्रकृतिका प्रवेशक नहीं कहा है। * उद्योतका कदाचित् प्रवेशक होता है। $ ५२. 'पवेसगो' इस पदका पहलेके समान अधिकारवश सम्बन्ध करना चाहिए । शंका-परन्तु उद्योतका कदाचित् प्रवेशकपना कैसे बनता है ? समाधान नहीं, क्योंकि पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोंमें ही उद्योतके उदयसे युक्त किन्हीं जीवोंके उद्योतका प्रवेशकपना देखा जाता है । विशेषार्थ-यहाँ नारकी, मनुष्य और देवोंमें उद्योतका उदय-उदीरणा सम्भव नहीं है, केवल तिर्यश्चोंमें ही, उनमें भी किन्हीं तिर्यञ्चोंमें ही उसका उदय-उदीरणा सम्भव है। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर 'उद्योतका कदाचित् प्रवेशक होता है, यह सूत्र वचन कहा है। * दो विहायोगति, सुभग-दुर्भग, सुस्वर-दुःस्वर, आदेय-अनादेय और यश कीर्तिअयशःकीर्ति इन युगलोंमेंसे किसी एक-एक प्रकृतिका प्रवेशक होता है ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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