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________________ गाथा ९४ ] दसणमोहोवसामणा २१५ ४२. एवं विदियगाहाए तदियावयवस्स अस्थविहासं समाणिय संपहि चउत्थावयवमस्सियूण मूलुत्तरपयडीणमुदीरणाणुदीरणगवेसणहमुत्तरं पबंधमाह * कदिण्हं वा पवेसगो त्ति विहासा। ४३. कदिण्हं वा पयडीणं मूलुत्तरभेयभिण्णाणमेसो पवेसगो होइ उदीरणासरूवेणे त्ति एवं पयस्सेदस्स पुच्छावक्कस्स अत्थविहासा एण्हिं कीरदि त्ति वुत्तं होइ । * मूलपयडीणं सव्वासिं पवेसगो।। ४४. मूलपयडीणं ताव सव्वासिमेव एसो पवेसगो होइ, सव्वासिमेव तासिं उदीरणाए पवेसिजमाणाणं णिप्पडिबंधमुवलंभादो । ___ * उत्तरपयडीणं पंचणाणावरणीय-चदुदंसणावरणीय-मिच्छत्त-पंचिंदियज्ञादि-तेजा-कम्मइयसरीर-वण्ण-गंध-रस-फास-अगुरगलहुग-उवघादपरघादुस्सास-तस-बादर-पजत्त-पत्तेयसरीर-थिराथिर-सुभासुभ-णिमिणपंचंतराइयाणं णियमा पवेसगो। ४५. किं कारणं ? एदासि पयडीणमेत्थ धुवोदयत्तदंसणादो । कालमें तथा प्रथम सम्यक्त्वके कालमें मरण नहीं होता। यही कारण है कि यहाँ पर प्रथम सम्यक्त्वके सन्मुख हुए जीवके पर भवसम्बन्धी आयुका उदयावलिमें प्रवेशका निषेध किया है। ४२. इसप्रकार दूसरी गाथाके तीसरे अवयवके अर्थका विशेष व्याख्यान करके अब चौथे अवयवका आश्रयकर मूल और उत्तर प्रकृतियोंकी उदीरणा और अनुदीरणाके अनुसन्धान करनेके लिये आगेके प्रबन्धको कहते हैं. * वह कितनी प्रकृतियोंका प्रवेशक होता है । ४३. मूल और उत्तर प्रकृतियोंके भेदसे अनेक प्रकारकी कितनी प्रकृतियोंका यहजीव उदीरणारूपसे प्रवेशक होता है इस प्रकार इस रूपसे प्रवृत्त हुए पृच्छावाक्यके अर्थका इस समय विशेष व्याख्यान करते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। . * मूल प्रकृतियोंको सबका प्रवेशक होता है। ४४. मूल प्रकृतियोंका तो सबका ही यह जीव प्रवेशक होता है, क्योंकि सभी मूल प्रकृतियाँ विना रुकावटके उदीरणारूपसे प्रवेश करती हुई पाई जाती हैं। * उत्तर प्रकृतियोंमें पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, मिथ्यात्व, पञ्चेन्द्रियजाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, त्रस, बादरं, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, निर्माण और पाँच अन्तराय इन प्रकृतियोंका नियमसे प्रवेशक होता है। ६४५. क्योंकि ये प्रकृतियाँ प्रकृतमें ध्रुवोदय देखी जाती हैं। विशेषार्थ-प्रथम सम्यक्त्व ग्रहणके सन्मुख हुए किसी भी गतिके जीवके अधःकरणके प्रथम समयमें पाँच ज्ञानावरण आदि प्रकृतियोंका नियमसे उदय होता है और इनका यहाँ उदय होनेका नियम है, इसलिये इनकी यहाँ उदीरणा होने में कोई रुकावट नहीं पाई जाती।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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