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________________ २१४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगद्दारं १० पयडीओ मूलुत्तरमेयभिण्णाओ कदि होंति त्ति एदस्स पुच्छाणिद्देसस्स णिण्णयविहाणट्ठमिदाणिमत्थविहासा कीरदि ति सुत्तत्थसंबंधो। * मूलपयडीओ सव्वाओ पविसंति । $ ३९. किं कारणं ? सव्वासिमेव मूलपयडीणमेत्युदयदंसणादो। * उत्तरपयडीओ वि जाओ अत्थि ताओ पविसंति । ४०. विजमाणाणमुत्तरपयडीणमेत्युदयाणुदयसरूवेणुदयावलियाणुप्पवेसे पडिबंधाभावादो। णवरि आउअस्स कम्मस्स एया पयडी विज्जमाणिया अबद्धपरभवियाउअस्स सा णियमा उदयावलियं पविसदि। बद्धपरभवियाउअस्स पुण दो पयडीओ विजमाणाओ होंति, तत्थ झुंजमाणस्सेव परभवियाउअस्स वि विजमाणत्तं पडि विसेसाभावादो उदयावलियप्पवेसे अइप्पसते तण्णिवारणहमिदमाह___* वरि जइ परभवियाउअमत्थि तं ण पविसदि । ४१. किं कारणं? जहण्णेण वि अंतोमुहुत्तमेवसेसभुजमाणाउअस्सेव सम्मत्तग्गहणपाओग्गत्तादो। . करनेवाली मूल और उत्तरके भेदसे अनेक प्रकारकी प्रकृतियाँ कितनी होती हैं इस प्रकार इस पृच्छानिर्देशका निर्णय करनेके लिये इस समय अर्थविभाषा करते हैं इस प्रकार सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्ध है। * मूल प्रकृतियाँ सब प्रवेश करती हैं। $ ३९ क्योंकि सभी मूल प्रकृतियोंका प्रकृतमें उदय देखा जाता है । * उत्तर प्रकृतियाँ भी जो सत्स्वरूप हैं वे प्रवेश करती हैं। $ ४०. विद्यमान उत्तर प्रकृतियोंके प्रकृतमें उदय-अनुदयरूपसे उदयावलिमें प्रवेश होने में रुकावटका अभाव है। इतनी विशेषता है कि जिसने परभवंसम्बन्धी आयुकर्मका बन्ध नहीं किया है उसके आयुकर्मकी एक प्रकृति सत्तामें विद्यमान है और वह नियमसे उदयावलिमें प्रवेश करती है। तथा जिसने परभवसम्बन्धी आयुकर्मका बन्ध कर लिया है उसके सत्कर्मरूपसे दो प्रकृतियाँ पाई जाती हैं। इसलिये भुज्यमान परभवसम्बन्धी आयुके समान उसके भी विद्यमानपनेकी अपेक्षा विशेषताका अभाव होनेसे उदयावलिमें प्रवेश करनेरूप अतिप्रसंग होनेपर उसका निवारण करनेके लिये इस सूत्रको कहते हैं ____ * इतनी विशेषता है कि यदि परभवसम्बन्धी आयु है तो वह उदयावलिमें प्रवेश नहीं करती। ४१. क्योंकि जिसके जघन्यरूपसे भी अन्तर्मुहूर्त मात्र ही भुज्यमान आयु शेष है उसके प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहणकी योग्यता होती है। विशेषार्थ—ऐसा नियम है कि जो जीव परभवसम्बन्धी आयुका बन्ध करता है उसके . बध्यमान आयुका आबाधाकाल बन्धके समय जितनी भुज्यमान आयु शेष हो उतना होता है । तथा जो जीव प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है उसका प्रथम सम्यक्त्वके उत्पन्न होनेके
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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